कविता
छोटी सी कुश की छप्पर,
बनी निर्झरणी के तट पर |
कच्ची माटी की दीवारे,
उस पर गिरि तर्ण की तारे |
बबूल की लकड़ी की छत,
किवाड़ दो एक हि चौखट |
टूट गई नीचे गिरकर,
छोटी सी कुश की छप्पर |
जाने पवन कहां ले गइ,
छत मड़ई कि उड़ा ले गइ !
तिन बह गए कही जल में,
चला गया सुख इक पल में !
नद की धारा में बहकर,
छोटी सी कुश की छप्पर |
नीर बहा आँखो से जब,
पुत्र लगे रोने को तब !
कोइ उन्हे चुप कराये,
और फिर इक घर बनाये |
उस नदियां के ही तट पर,
छोटी सी कुश की छप्पर |
निहाल सिंह
झुंझुनू, राजस्थान

hi
ردحذفvery nice news
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