चंपक अपनी बैलगाड़ी में फलों और सब्जियों के बड़े-बड़े बक्से लेकर शहर में बेचने जा रहा था। शहर जाने में उसे करीब एक दिन लगता था। वह सुबह गांव से निकला था और अब दोपहर हो गयी थी, तभी अचानक उसकी बैलगाड़ी एक खड्डे में गिरकर पलट गयी।
वह अपनी बैलगाड़ी सीधी करने की बहुत कोशिश करने लगा। वहा नजदीक एक ढाबे पे बैठा एक आदमी ये सब देख रहा था। उसने चंपक को दूर से ही बोला, “अरे भाई, परेशान मत हो, आ जाओ मेरे साथ पहले खाना खा लो फिर मैं तुम्हारी बैलगाड़ी सीधी करवा दूंगा।”
उसकी बात सुनकर चंपक बोला, “मैं अभी नहीं आ सकता। मेरा दोस्त नाराज हो जायेगा।” ढाबे पर बैठा आदमी ने कहा, “अरे भाई तुज़से अकेले नहीं उठेगी यह बैलगाड़ी। तू आजा खाना खा ले फिर हम दोनों उठाएंगे।”
“नहीं मेरा दोस्त बहुत गुस्सा हो जाएगा” चंपक बोला।
उस आदमी ने फिर से कहा, “अरे मान भी जाओ। आ जाओ इधर बैठो।”
चंपक ने कहा, “ठीक है आप कहते है तो आ जाता हूँ। “
चंपक ने जमकर खाना खाया और फिर बोला, “अब मैं गाड़ी के पास चलता हूँ और आप भी मेरे साथ चलिए। मेरा दोस्त गुस्सा हो रहा होगा।”
ढाबे पर बैठे आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो चलते है, पर तुम इतना डर क्यों रहे हो? वैसे कहा है तुम्हारा दोस्त?”
चंपक ने कहा, “बैलगाड़ी के निचे दबा हुआ है।”

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