बूँद

 बूँद

मैं बूँद हूँ

अपनी लघुता का एहसास है मुझे

किंतु महज बूँद होने से 

मेरा अस्तित्व, अस्मिता 

और महत्व

कम नहीं होता

समुद्र बेशक बड़ा है

जानती हूँ

मैं समुद्र नहीं बन सकती

मानती हूँ

किंतु मैं

बूँद बूँद करके

सागर बनाती हूँ

अपना अस्तित्व मिटाकर

तालाब नदी और रत्नाकर के जल में

विलीन हो जाती हूँ

यही मेरी साधना है

और सिद्धि भी


मैं दुःखी हूँ... 

यह सोचकर नहीं

कि मैंने अपना अस्तित्व खोया

दुःखी हूँ इसलिए कि

तालाब नदी और समुद्र को

सब याद रखते हैं

भूलते हैं 

मुझ नन्ही सी बूँद को

मेरी महत्ता, अर्थवत्ता

और उदारता को... 



डॉ० मंजु सिंह "मरालिका"

बानपुर कोठी, गांधी नगर

बस्ती (यू. पी.)

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