गजल

 गजल 

शायद  खुद में खुद को ही ढूंढ  रही हूँ  मै

ज़ीस्त जीने की सही अदब  ढूढ़ रही हूँ मैं!

पता नही  तेरे घर का, ख़त लिखा है  मगर

तुझतक आने की एक वज़ह ढूंढ़ रही हूँ मैं!

शख़्स  रूहों में कुछ  इसक़दर शामिल  है

खुद मे  खूद की  ही  नज़र ढूंढ़ रही हूँ  मैं!

ज़फा मशगूल हैं रगीं फ़िजाओ में शोहरत की

खुद के लिए सुकूँ तेरी  नज़्म ढूंढ़ रही हूँ मैं !

खिड़कियों को खुला छोडा़ हैं चाँदनी रात में

चाँद उतर आये कमरें में सहर ढूंढ़ रही हूँ मैं !

निगाहों से बंया हो जाये दिल में उतर आये

वो ख़ामोशियों की इक ग़ज़ल ढूंढ़ रही हूँ मैं

अंकिता सिन्हा 

जमशेदपुर, झारखण्ड

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