ले चले मुझे....

 ले चले मुझे....



कितने एहसासो को 

जिऊँ मै?

बोझिल थके कदमों से 

अनगिनत सफ़र

तय किए है मैंने

टूटकर चकनाचूर हूए 

ख़्वाबों की अर्थियाँ 

बहुत देखी  हैं ....

और ना जाने कितने

अरमानो का खून 

किया है मैने ...

कोई तो हो जो प्यार से 

सोख़ ले मुझे...

बंदिशें डाले पांव में और 

रोक ले मुझे

गहरी गमगीन रातों में 

ना जाने कितनी 

सहर है छुपीं

थामे हाथ हक से 

और ले चले मुझे।


निधि भार्गव "मानवी"

दिल्ली


Post a Comment

أحدث أقدم