याद करें बचपन से पचपन तक

 याद करें बचपन से पचपन तक


हमने तो ज़माने और रीति रिवाज़ को बदलते अपनी आँखों से देखा है वो शायद! नई पीढ़ी को देख पाना असंभव है।
हम वो आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखे लिए।बैरंग, अन्तर्देशीय,पोस्टकार्ड से लेकर लाइव चैटिंग तक देखे हैं।
कच्चे मिट्टी के घरों में बैठ कर दादी नानी से राजा-रानी परियों की कहानी सुनी है।
हम वो पीढ़ी हैं जिन्होनें अपने माता -पिता की बात मानी और आज तक बच्चों की मान रहे हैं।
पर नई पीढ़ी बदल गई अब बच्चे मां-बाप की नहीं सुनते!
हमने रेडियो से लेकर दूरदर्शन तक देख लिया
हमने बचपन में परम्परागत खेल छुपन-छुपाई,खो-खो,कबड्डी,कंचे जैसे खेल खेले हैं।
हम वो आखिरी पीढ़ी हैं जिन्होंने चांदनी रात में ढीबरी,लालटेन,की रोशनी में होमवर्क किया है।
हम वो पीढ़ी के लोग हैं जो कुआं से लेकर हैन्डपम्प, और आज आरो के पानी पी रहे हैं।
मिट्टी के चूल्हे में सिकीं सौन्ही-सौन्ही रोटियां, हाथों के चक्की से पिसे हुए गेहूं के आटे की खाई हैं।
और आज पैकेट में आटे,स्टील के चूल्हे गैस पर सिंकी रोटियां खा रहे हैं ।
खुद के गाय भैंस के ताजे दूध पीकर आज रेडीमेड दूध भी पी रहे हैं ।ये है नयी पीढ़ी! उच्चारण में पिताजी से पापा जी ,अम्मा से मम्मी,चाचा-चाची से अंकल-आंटी को भी देख लिए ।
शिष्टाचार -यहाँ तक बालविवाह से लेकर "लिव इन रिलेशन" का ज़माना भी देख लिए।
वर्तमान समय में अनेक सुविधाएं भी देखी!
और हम आज बदलती दुनिया के अविश्वसनीय नज़ारे भी देख रहे हैं।
इस कोरोना काल में परिवारिक रिश्तेदारों अधिकतर पति-पत्नी, बाप-बेटा,भाई-बहन को एक दूसरे को छूने से डरते देख रहे हैं।
परिजन की बात तो दूर !!!खुद इंसान नाक मुँह छूने से डरने लगे हैं।
हम आज अर्थी को बिना चार कंधों के श्मशान जाते देख रहे हैं!
पार्थिव शरीर को बिना नहलाए बिना कफ़न के दूर से अग्निदाह करते देख रहे हैं।
गरीबों को शव मिट्टी में दबाते भी देख रहे हैं। इंसानियित को तिल-तिल मरते देख रहे हैं।
अगली पीढ़ी कैसी होगी भगवान जानें।।।

सरोज सिंह "सजल"
दिल्ली

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