चक्रवात..
जब भी
दर्द की उष्मा का दबाव
घेर लेता है चारों तरफ़ से हमें
तब आता है
मन के अथाह सागर में
चक्रवात
पीड़ा के
इसी तूफ़ानी बवंडर की
तेज़ आँधी संग
भँवर में डूब रही हूँ मैं
मेरा संबल
और ना जाने क्या क्या
इसकी घातक चपेट से
बचने के लिए
पूरी मज़बूती से पकड़ रखा है मैंने
एक मात्र शेष
हिम्मत व हौसले के
डगमगाते से भुरभुराते से
टीले को
निराशा के
इन घनघोर अँधेरें में
मद्यम रोशनी लिए
टिमटिमा रहा है
छोटा सा टूटा फूटा सा
उम्मीद का लालटेन
जो रह रह कर उगल रहा है
कैरोसिन का डरावना काला धुआँ
ये उम्मीद का लालटेन
है तो कुछ धुंधला सा ही
पर तस्सली है कि
कम से कम
अब तक रोशन तो है ..
लीना खेरिया
अहमदाबाद
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