में अहर्निश बह रहा हूँ कह रहा हूँ

 में अहर्निश बह रहा हूँ कह रहा हूँ

ब्रह्म की में ही कथाएँ कह रहा हूँ


कामनाओं के बिछाए जाल में में

हाँ उलझ कर वेदनाएँ सह रहा हूँ


में किनारो पर ठहर सकता नही था

वक्त के धारो सतत ही बह रहा हूँ


शोर के सँग  शोर बन कर भी रहा में

मोन के सँग मोन भी में रह रहा हूँ


था कभी चट्टान बन कर सामने अब

रेत के महलों सरीखा ढह रहा हूँ


मौज आवारा भी मुझमे थी कभी तो

सागरो की में ही ठहरी तह रहा हूँ


दौर कर्कश ने झुका डाला जरा पर

में जबानों का कभी तो अहं रहा हूँ


में अहर्निश बह रहा हूँ कह रहा हूँ

ब्रह्म की में ही कथाएँ कह रहा हूँ


मुकेश सोनी "सार्थक"

रतलाम, मध्य प्रदेश


Post a Comment

أحدث أقدم