हम दूर हो रहे हैं ...

 हम दूर हो रहे हैं ...

जिन्दगी के सफर में 

कही जिंदगी खो गई है 

जितना भी ढूँढती हूँ 

उतने ही दूर हो गई है ।

बस सवालों का जवाब 

इस कदर ढूंढते हैं 

जवाबों में ही उलझे 

धागे से हो गये हैं ।

वक्त के भंवर में भटकते 

किस ओर जा रहे हैं 

नैया है न तो माझी  

खुद को डुबो रहे हैं ।

सब कुछ बदल गया है 

इस दौर में जो देखो 

मकानों का ऐसा जंगल 

अपने बिछड़ रहे हैं ।

इतवार का हर वो जश्न 

पुराने गीत गा रहे थे 

अपने खुशी का आलम 

बिखेरे ही जा रहे थे ।

ख़ुशियाँ जो तुम लुटाओ 

तो उसको सम्भाल रखना 

छोटी सी बात पर हरकत 

अब लोग जल रहे हैं ।



पुष्पा त्रिपाठी ‘पुष्प’

बेंगलोर, कर्नाटक

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