जाने कितने स्वांग रचाती हैं रोटियां,,
गरीबों को पल पल नचाती हैं रोटियां,
दिन भर करे जो एड़ी चोटी
मुश्किल से पाता दो जून की रोटी,
जो रिक्शा धूप और बरसात में दिनभर चलाता है,सोचो तो जरा कैसे वो अपना घर चलाता है,एक गरीब का
यूं रोटियों की चाह में छिन गया घर द्वार,
मुंह बांह रही रोटियां,अब किसका इंतज़ार।
यूं तो बादशाहत कुर्सी की, रोटी की तलबगार,
ईमान बेचकर करें, बिचौलिए इंतजार,
कालाबाजारी और भ्रष्टाचार से करें, मौत का व्यापार,हाय रे रोटी,तेरी महिमा है अपरम्पार।
सरस्वती धानेश्वर


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