एक्सक्लूसिव: दिलीप कुमार अब इस दुनिया में नहीं रहे

नई दिल्ली (संपर्क क्रांति विशेष रिपोर्ट) l सदाबहार अभिनेता दिलीप कुमार का बुधवार की सुबह निधन हो गया थाl अब शाम 5:00 बजे के लगभग मुंबई के जुहू स्थित कब्रिस्तान में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया हैl इस अवसर पर उनकी पत्नी सायरा बानो परिवार के लोग और बड़ी संख्या में प्रशंसक भावभीनी श्रद्धांजलि देने के लिए उपस्थित हुए थेl दिलीप कुमार का निधन मुंबई के अस्पताल में हुआ थाl वह उम्र से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित थेl उनकी उम्र 98 वर्ष थीl इंस्टाग्राम पर एक वीडियो वायरल हो रहा हैl इसमें दिलीप कुमार का कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार करते देखा जा सकता हैl पुलिसकर्मियों को तिरंगा हाथ में लेकर श्रद्धांजलि देते देखा जा सकता हैl इस अवसर पर दिलीप कुमार के करीबी कब्रिस्तान में नजर आ रहे हैंl दिलीप कुमार का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया गया हैl दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि देने शाहरुख खान, धर्मेंद्र, महाराष्ट्र मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और रणबीर कपूर जैसी कई हस्तियां पहुंची थीl शाहरुख खान सायरा बानो को संभालते भी नजर आएंl वहीं धर्मेंद्र उनके भाई के करीब बैठे नजर आएl दिलीप कुमार ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में 'ज्वार भाटा' नामक फिल्म से 1944 में डेब्यू किया थाl इसके बाद 1944 में आई फिल्म जुगनू से वह लोकप्रिय हुएl उन्होंने मुग़ल-ए-आज़म, क्रांति, गंगा जमुना और देवदास जैसी कई फिल्मों में काम कियाl दिलीप कुमार को 1991 में पद्म भूषण और 2015 में पद्म विभूषण दिया गया थाl दिलीप कुमार के निधन से बॉलीवुड में शोक की लहर फैल गई हैl कई कलाकारों ने सोशल मीडिया पर भी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी हैl दिलीप कुमार के निधन पर शोक जताते हुए उनकी पत्नी सायरा बानो ने कहा है कि उनके जीने की वजह भगवान से छीन ली हैl दिलीप कुमार को कुछ दिनों पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया थाl हालांकि उनकी तबियत बिगड़ती गई और आज सुबह उनका निधन हो गयाl

दिलीप कुमार के साथ डेब्यू करने वाले थे अभिषेक बच्चन

दिलीप कुमार के साथ पर्दे पर एक दृश्य में आना किसी भी कलाकार के लिए पुरस्कार से कम नहीं होता था। अमिताभ बच्चन को यह मौक़ा सिर्फ़ एक फ़िल्म में मिला। धर्मेंद्र ने दिलीप साहब के साथ फ़िल्म की, मगर उनके साथ कोई दृश्य नहीं था। नई सदी के सितारों में अभिषेक बच्चन को यह मौक़ा मिलने वाला था, लेकिन मुराद पूरा नहीं हुई। अभिषेक ने दिलीप साहब को याद करते हुए एक भावुक नोट लिखा, जिससे उनका डेब्यू होने वाला था और दिलीप कुमार उनके पिता का किरदार निभाने वाले थे, मगर बदक़िस्मती से यह फ़िल्म नहीं बनी। यह फ़िल्म थी आख़िरी मुग़ल। अभिषेक ने अपने नोट में लिखा- मेरी पहली फ़िल्म आख़िरी मुग़ल होनी थी। दिलीप साहब मेरे पिता का किरदार निभाने वाले थे। मुझे अच्छे से याद है कि मेरे पिता ने मुझसे कहा था कि अपने आदर्श के साथ स्क्रीन शेयर करने का सम्मान मिलने में उन्हें एक दशक से अधिक लग गया और मुझे डेब्यू फ़िल्म में ही यह मौक़ा मिल रहा है। उन्होंने मुझसे इन पलों का आनंद उठाने और उन्हें (दिलीप साहब) देखकर ज़्यादा से ज़्यादा सीखने के लिए कहा था। ऐसी फ़िल्म, जिसमें मुझे अपने आदर्श के साथ काम करने का मौक़ा मिले, वो आदर्श है। मैं कितना ख़ुशक़िस्मत था। अफ़सोस, वो फ़िल्म कभी नहीं बनी और मुझे यह कहने का सम्मान नहीं मिला कि मैंने महान दिलीप कुमार जी के साथ फ़िल्म में काम किया है। आज सिनेमा एक युग का अंत हो गया है। शुक्र है कि बहुत सी पीढ़ियां देख और सीख सकेंगी, लेकिन उससे ज़रूरी, उनके सिनेमा के ज़रिए दिलीप साहब के हुनर और सम्मान को महसूस करेंगी। आपने अपने काम से जो हमें आशीर्वाद दिया है, उसके लिए शुक्रिया।  अभिषेक ने अंत में सायरा बानो और परिवार के लिए संवेदनाएं दीं। आख़िरी मुग़ल को जेपी दत्ता ही बना रहे थे। इस फ़िल्म में अभिषेक के साथ बिपाशा बसु डेब्यू करने वाली थीं। दिलीप कुमार ने 1998 में आयी क़िला के बाद फ़िल्मों से संन्यास ले लिया था और इसके बाद वो कभी स्क्रीन पर नहीं आये। अभिषेक ने बाद में जेपी दत्ता की ही फ़िल्म रिफ्यूजी से 2000 में डेब्यू किया था।

अंतिम दर्शन करने पहुंचे जॉनी लिवर, हंसते हुए दिया पोज़, लोग बोले- ‘ये इतना खुश क्यों हो रहे हैं’

आज सुबह करीब 730 बजे मुंबई के हिंदूजा अस्पताल में लेजेंड अभिनेता ने आखिरी सांस ली और इस दुनिया से रुखसत हो गए। आज शाम को पांच बजे जुहू के संताक्रूज़ कब्रिस्तान में दिलीप साहब को दफनाया जाएगा। बॉलीवुड के लेजेंड अभिनेता दिलीप कुमार अब इस दुनिया में नहीं रहे। आज सुबह करीब 7:30 बजे मुंबई के हिंदूजा अस्पताल में लेजेंड अभिनेता ने आखिरी सांस ली और इस दुनिया से रुखसत हो गए। आज शाम को पांच बजे जुहू के संताक्रूज़ कब्रिस्तान में दिलीप साहब को दफनाया जाएगा। उससे पहले एक्टर के बॉलीवुड के तमाम सेलेब्स उनके आखिरी दर्शन करने उनके घर पहुंचे और उन्हें श्रद्धांजिल। फिल्म अभिनेता शाहरुख ख़ान से लेकर शबाना आजमी, धर्मेंद्र तक ने दिलीप साहब को आखिरी विदाई देने उनके घर पहुंचे। इन सबके बीच बॉलीवुड के बेस्ट कॉमेडी एक्टर जॉनी लीवर में दिलीप साहब के घर जाते हुए नज़र आए, लेकिन इस दौरान एक्टर ने कुछ ऐसा किया जो कुछ लोगों के नागवार गुज़र रहा है। दरअसल, जॉनी लीवर फिल्म अभिनेता और अपने दोस्त जूनियर महमूद के साथ दिलीप साहब के घर पहुंचे इस दौरान जाते हुए पैपराज़ी ने जॉनी लीवर को आवाज़ दी, आवाज़ सुनकर जॉनी लीवर ने पैपराज़ी की तरफ देखा और हंसकर हाथ हिलाने लग। दिलीप कुमार के निधन के बाद अंतिम दर्शन के लिए जाते हुए जॉनी लीवर का इस तरह हंसते हुए पोज़ देना कुछ लोगों को पसंद नहीं आ रहा है और एक्टर के लिए अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो जॉनी लीवर का पक्ष ले रहे हैं और बोल रहे हैं कि वो रोड पर हैं दिलीप कुमार के घर पर नहीं जो मुस्कुरा नहीं सकते।

राजकीय सम्मान के साथ विदा हुए दिलीप साहब..

दिलीप साहब को कब्रिस्तान ले जाते हुए उनके कुछ वीडियो सामने आए हैं जिनमें बैंड के साथ राजकीय सम्मान के साथ उन्हें विदा किया जा रहा है। इस दौरान वहां भारी तादात में पुलिसवाले भी मौजूद हैं जो उन्हें राजकीय सम्मान देंगे। दिलीप साहब को आखिरी बार देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा है। वीडियो में दिलीप कुमार का पर्थिव शऱीर तिरंगे में लिपटा हुआ नज़र आ रहा है।

धर्मेंद्र ने एक अवॉर्ड शो में इमोशनल होकर कहा था- 'हम एक मां की कोख से क्यों पैदा नहीं हुए'

बात 1997 की है। 42वें फ़िल्मफेयर अवॉर्ड शो का मंच था। धर्मेंद्र को लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया गया था। हिंदी सिनेमा के इस दिग्गज कलाकार को अवॉर्ड देने ख़ुद सिनेमा के थेस्पियन दिलीप कुमार आये थे। शाह रुख़ ख़ान और सायरा बानो साथ में थे। इस अवॉर्ड को स्वीकार करते हुए धर्मेंद्र बेहद भावुक हो गये। 37 सालों तक इंडस्ट्री में बेहतरीन किरदार और फ़िल्में करने के बावजूह उन्हें कोई अवॉर्ड नहीं मिला था। लाइफ़ टाइम एचीवमेंट अवॉर्ड मिला तो यह तल्ख़ी जज़्बात के रूप में जुबां पर आ गयी। वहां, मौजूद दिलीप कुमार ने तब धर्मेंद्र को अपने छोटे भाई की तरह संभाला और पुचकारा था। दिलीप कुमार को लेकर धर्मेंद्र हमेशा से बेहद जज़्बाती रहे हैं। इस अवॉर्ड फंक्शन में उन्होंने दिलीप साहब को अपना भाई बताते हुए कहा था- इन्हें मैं बहुत प्यार करता हूं। मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि हम एक ही मां की कोख से पैदा क्यों नहीं हुए। वहीं, दिलीप कुमार ने धर्मेंद्र को दुलारते हुए उनके बारे में कहा था- जब मैंने पहली बार धरम को देखा था और देखते ही मेरे दिल में उमंग पैदा हुई, अल्लाह मुझे ऐसा ही बनाया होता तो क्या जाता। धर्मेंद्र सोशल मीडिया में अक्सर दिलीप कुमार के साथ अपनी यादें शेयर करते रहे हैं। ऐसी ही एक तस्वीर में धर्मेंद्र ने लिखा था- यादें, जो दर्द दे जाती हैं। इस फोटो में धर्मेंद्र दिलीप कुमार से बेहद दोस्ताना अंदाज़ में मिल रहे हैं। सायरा बानो पास में बैठी मुस्कुरा रही हैं। यश चोपड़ा भी दिख रहे हैं। फरीदा जलाल, अंजू महेंद्रू, हेलन और गोविंदा को इस तस्वीर में देखा जा सकता है। धर्मेंद्र दिलीप कुमार को हमेशा से अपना आदर्श मानते रहे हैं। इंटरव्यूज़ में उन्होंने अक्सर यह बात कही है कि दिलीप कुमार ने ही उन्हें फ़िल्मों में आने के लिए प्रेरित किया था। उनकी फ़िल्म शहीद देखकर धर्मेंद्र को हीरो बनने का चस्का लगा था। धर्मेंद्र ने दिलीप कुमार के साथ पहली बार बंगाली फ़िल्म पारी में काम किया था, जिसे बाद में अनोखा मिलन शीर्षक से हिंदी में बनाया गया था। हालांकि, इस फ़िल्म में धर्मेंद्र ने दिलीप कुमार के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर नहीं किया था। धर्मेंद्र ने इस फ़िल्म का पोस्टर शेयर करके 2019 में इस बात पर अफ़सोस जताया था कि इसके बाद किसी फ़िल्म में काम करने का मौक़ा नहीं मिला था।  बुधवार को दिलीप कुमार के निधन की ख़बर सुनकर धर्मेंद्र उनके घर पहुंचे और सायरा बानो को सांत्वना दी। वहीं ट्विटर पर उन्होंने लिखा कि इंडस्ट्री में अपने अज़ीज़ भाई को खोकर वो बेहद दुखी हैं। हमारे दिलीप साहब को जन्नत नसीब हो।

पिता की पिटाई के डर से बदला था फ़िल्मों में नाम

अपनी अदाकारी से भारतीय सिनेमा को परिभाषित करने वाले आला अदाकार दिलीप कुमार के नाम को लेकर भी कई कहानियां प्रचलित हैं कि मुहम्मद यूसुफ़ ख़ान दिलीप कुमार क्यों बने? यह सवाल दिलीप साहब के सामने उन तमाम पुराने इंटरव्यूज़ में भी आता रहा है और उन्होंने इसकी असल वजह का खुलासा भी किया। 1970 में दिलीप कुमार ने अपना फ़िल्मी नाम दिलीप कुमार रखने की बड़ी दिलचस्प वजह बतायी थी।  इस इंटरव्यू में दिलीप कुमार से जब यह सवाल पूछा जाता है तो लीजेंड्री एक्टर पहले हंसते हैं और फिर कहते हैं- हक़ीक़त बताऊं... पिटाई के डर से मैंने यह नाम रखा। मेरे वालिद फ़िल्मों के सख़्त मुख़ालिफ़ थे और उनके अज़ीज़ दोस्त लाला बशेश्वर नाथ थे, जिनके साहबज़ादे पृथ्वीराज कपूर भी फ़िल्म एक्टिंग किया करते थे। वो अक्सर बशेश्वर नाथ जी से बड़ी शिकायत करते थे कि तुमने यह क्या कर रखा है कि तुम्हारा इतना सेहतमंद और नौजवान लड़का (पृथ्वीराज कपूर) क्या काम करता है। तो जब मैं फ़िल्मों में आया... तो मुझे वो तनक़ीद और... पठान आदमी थे, गुस्सावर आदमी थे। उनका ख़ौफ़ भी था कि जब इनको मालूम होगा तो नाराज़ भी बहुत होंगे। उस वक़्त दो-तीन नाम सामने रखे गये- यूसुफ़ ख़ान नाम रखा जाए या दिलीप कुमार रखा जाए या वासुदेव रखा जाए...तो मैंने ज़ाती तौर पर कहा कि यूसुफ़ ख़ान मत रखिए, बाक़ी जो दिल में आये रख दीजिए। दो-तीन महीनों बाद जब मैंने इश्तेहार में देखा तो मालूम हुआ कि मेरा नाम दिलीप कुमार तजवीज़ किया गया। दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसम्बर 1922 को पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार में हुआ था। दिलीप कुमार के पिता का नाम लाला गुलाम सरवर ख़ान था और उनकी मां का नाम आएशा बेगम था। राज कपूर उनके बचपन के दोस्त थे। दिलीप कुमार ने 1944 में आयी फ़िल्म ज्वार भाटा से बतौर अभिनेता अपना करियर शुरू किया था, मगर बड़ी कामयाबी 1947 में आयी फ़िल्म जुगनू से मिली थी, जिसमें नूरजहां उनकी हीरोइन थीं। इसके बाद 1948 में आयीं शहीद और मेला ज़बरदस्त हिट रही थीं। राज कपूर के साथ दिलीप कुमार ने 1949 में अंदाज़ फ़िल्म की थी, जिसमें नर्गिस फीमेल लीड थीं। वहीं, पृथ्वीराज कपूर के साथ दिलीप कुमार ने हिंदी सिनेमा की आइकॉनिक फ़िल्म मुग़ले-आज़म दी। इस फ़िल्म में पृथ्वीराज शहंशाह अकबर और दिलीप कुमार शहज़ादा सलीम के रोल में थे। मधुबाला ने अनारकली का किरदार निभाया था।

दिलीप कुमार की लव लाइफ:कामिनी कौशल और मधुबाला से अधूरा रह गया था प्यार

बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर दिलीप कुमार का असली नाम मुहम्मद यूसुफ खान है। उनका जन्म 11 दिसंबर 1922 को पेशावर में हुआ था। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में दिलीप कुमार अपने परिवार के साथ मुंबई आ गए थे और फिर वहीं उन्होंने अपने एक्टिंग करियर की शुरूआत की थी। दिलीप कुमार की लव स्टोरी की बात करें तो उनकी शादी तो सायरा बानो से हुई लेकिन इससे पहले उनके दो प्यार अधूरे रह गए। आइए जानते हैं उनकी लव स्टोरी के बारे में...\

दिलीप कुमार को सबसे पहले कामिनी कौशल से प्यार हुआ था

दिलीप कुमार को सबसे पहले, जिनसे प्यार हुआ वे थीं एक्ट्रेस कामिनी कौशल। दोनों का रोमांस 1948 में रिलीज हुई फिल्म 'शहीद' के सेट पर शुरू हुआ था। जल्दी ही दोनों शादी प्लानिंग भी करने लगे थे। पर जिस वक्त कामिनी दिलीप साहब को डेट कर रही थीं, उस वक्त वे शादीशुदा थीं। कामिनी ने जिनसे शादी की थी, वे उनकी बड़ी बहन के पति थे। दरअसल, कामिनी की बहन की सड़क हादसे में मौत हो गई थी और उनका एक बच्चा भी था, जिसकी खातिर फैमिली के दबाव में कामिनी ने अपने जीजा बी.एस. सूद से शादी कर ली थी। जब कामिनी के भाई को इस बात का पता चला कि उनकी शादीशुदा बहन दिलीप कुमार को डेट कर रही हैं तो वे गुस्से से लाल हो गए थे। फिर उन्होंने दिलीप कुमार को धमकी दी कि वे कामिनी से रिश्ता तोड़ लें। 

मधुबाला थीं दिलीप कुमार का दूसरा प्यार

मधुबाला दिलीप साहब को मन ही मन काफी पसंद किया करती थीं, लेकिन वे अपने प्यार का इजहार करने में घबराती थीं। शायद उन्हें डर था कि कहीं दिलीप साहब उनके प्यार को ठुकरा न दें, लेकिन 'तराना' के सेट पर मधुबाला ने हिम्मत की और दिलीप कुमार के नाम एक खत लिखा, उस खत के साथ एक लाल गुलाब रखा। खत में मधुबाला ने लिखा कि 'मैं आपसे बहुत मोहब्बत करती हूं और यदि आप भी मुझसे प्यार करते हैं तो यह गुलाब कुबूल करें वरना उसे वापस कर दें। फिर दिलीप साहब ने मधुबाला के प्यार के पैगाम को कबूल कर लिया और गुलाब अपने पास रख लिया। बाद में दोनों ने सगाई कर ली। मधुबाला के पिता और दिलीप साहब के बीच अहंकार की बड़ी दीवार थी और यही वजह थी कि दिलीप कुमार और मधुबाला का ब्रेकअप हो गया।

1966 में दिलीप कुमार ने सायरा बानो से शादी की थी

शादी के वक्त सायरा बानो 22 साल की और दिलीप साहब 44 साल के थे। समय के साथ-साथ दोनों का प्यार और भी गहरा होता चला गया। दोनों जब सबके सामने हाथों में हाथ थामे आते थे, तो लोग इनकी जोड़ी को देखते ही रह जाते थे। पिछले दिनों जब दिलीप साहब को आईसीयू में भर्ती कराया गया था, तब सायरा बानो हर वक्त दिलीप साहब की देखभाल करते हुए नजर आई थीं।

टैगोर ने कहा-दास्तान की शूटिंग के समय दिलीप कुमार के साथ बैडमिंटन खेलती थी

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार 98 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए। उन्होंने मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल में अपनी अंतिम सांसें लीं। दिलीप साहब ने फिल्म 'ज्वार भाटा' (जो कि 1944 में रिलीज हुई थी) से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी। उनके कुछ चाहने वालों ने उनके बारे में खास बातें शेयर की हैं। आईये जाने कि वो क्या हैं-

'दास्तान' की शूटिंग के समय उनके साथ बैडमिंटन खेलती थी: शर्मिला टैगोर

मैंने उनके साथ एक ही फिल्म 'दास्तान' में काम किया है, पर उनकी बहनों के साथ मेरी अच्छी दोस्ती थी। मैं उनके भाई को भी जानती थी, उनके घर मेरा आना-जाता लगा रहता था। जब कभी-कभी वो मुझे मिलते थे, तब वो बहुत प्यार से बात करते थे। उनके साथ की यादें बहुत सारी हैं। आज उनके न रहने पर मुझे उनकी बहुत याद आ रही है। वे बहुत अच्छे एक्टर थे और वो एक्टिंग पर ज्यादा ध्यान देते थे, उनका पैसों की तरफ उतना ध्यान नहीं रहता था। वो एक वक्त पर एक ही फिल्म करते थे, कभी दो फिल्में एक साथ नहीं करते थे। जबकि उनके साथ काम करने वाली हिरोइनें दो से तीन फिल्मों में एक साथ काम करती थीं। वे डेट कैसे मैनेज करती थीं, वह मुझे नहीं पता, लेकिन उनका काम करने का यही तरीका था। उनकी डायलॉग डिलीवरी में भी एक खासियत थी। सब चाहते थे कि वे दिलीप कुमार जैसे डायलॉग बोलें, पर उनकी स्टाइल को कोई कॉपी नहीं कर पाया। दिलीप साहब अपनी फैमिली से बहुत प्यार करते थे। वो अपनी पूरी फैमिली के साथ ही रहते थे। उन्होंने अपनी फैमिली के लिए बहुत कुछ किया। वो इंडस्ट्री के लिए भी बहुत कुछ करते थे जैसे जब कोई हादसा हो या क्रिकेट मैच हो तब वो फंड रेज करते थे। उसमें भी वो बहुत एक्टिव रहते थे और सबके प्रति हमदर्दी रखते थे। यह सोशल मीडिया के पहले की बात है। जब उनकी फिल्म देखने के लिए लंबी लाइन लगती थी। उनकी 'मधुमती' जैसी तमाम फिल्में हैं, जो कभी भुलाई नहीं जा सकती। मैं दिलीप साहब के साथ जब फिल्म 'दास्तान' कर रही थी, तब हमने बी.आर चोपड़ा के घर की बाउंड्री के अंदर इनडोर बैडमिंटन कोर्ट बनाया था। यूसुफ साहब वहां बैडमिंटन खेलते थे। कभी-कभी मुझे भी खेलने के लिए बुलाते थे। वो बहुत अच्छे प्लेयर थे। उन्हें एक्सरसाइज करना और चेस खेलना बहुत पसंद था। उनका फिल्मों के साथ-साथ बाकी चीजों में भी इंटरेस्ट था। उन्हें हर चीज के बारे में नॉलेज थी। वो हर विषय पर बात कर सकते थे और हर चीज में दिलचस्पी रखते थे। वे जब बात करते थे, तब हम सब सुनते रह जाते थे। साहब हमारी इंडस्ट्री के सबसे इंपोर्टेंट पार्ट थे। उनका करियर दशकों तक चला। अफसोस है कि काफी समय से उनकी तबियत ठीक नहीं थी। यह खबर सुनने के बाद मैंने सायरा जी को मैसेज किया है। वे बहुत अच्छी हैं। नवाब साहब के इंतकाल के बाद यूसुफ साहब ने मुझे खत लिखा था। वह बहुत खूबसूरत खत था। आज भी मैंने उस खत को संभाल कर रखा है।

जयपुर दंगों में शांतिदूत बनकर आए थे दिलीप कुमार

बॉलीवुड में ट्रेजडी किंग कहलाने वाले के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार का बुधवार सुबह करीब 7:30 बजे निधन हो गया। वे 98 साल के थे। उन्होंने मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। दिलीप कुमार राजस्थान से से गहरा नाता रहा। फिर चाहे जयपुर में हुए दंगे में शांतिदूत बनना हो या फिर 75वीं वर्षगांठ दिलीप कुमार राजस्थान आने से नहीं चूके। 29 साल पहले जयपुर के शास्त्री नगर इलाके में सांप्रदायिक दंगे हुए। जिसमें कई लोगों की जान गई। जमकर तोड़फोड़ और आगजनी हुई। जान-माल को नुकसान हुआ। तब दिलीप कुमार जयपुर में शांतिदूत बनकर आए। वाई माधोपुर में डॉक्टर अजीज आजाद ने भास्कर से यादें ताजा करते हुए बताया कि 1992 में शास्त्री नगर में दंगों के बाद शांति बहाल करना बड़ी चुनौती बन गया था। हिंदू मुस्लिम परिवारों में भय बना हुआ था। सरकार भी चिंतित थी। तब शांति एवं सद्भावना बनाने के लिए सामाजिक समरसता और सामाजिक सद्भाव के लिए एक मंच बनाया गया था। इसमें पूर्व मंत्री रह चुके नवाब दुर्रु मियां ने अपने व्यक्तिगत नजदीकी रिश्तों के जरिए मुंबई में दिलीप साहब से बात की। उस वक्त उनका जबर्दस्त जलवा था। हर कोई उनका बड़ा फैन था। दुर्रु मियां ने बातचीत में सद्भावना रैली में दिलीप साहब से शामिल होने का आग्रह किया। तब वे तुरंत मान गए।

10 हजार स्कूली बच्चों की रैली में सबसे आगे चले, दंगा प्रभावित इलाकों में की सद्भावना की अपील

डॉ. अजीज ने बताया कि दिलीप साहब जयपुर पहुंचे। तब वे खुद भी अपने पिता अलाद्दीन आजाद के साथ जयपुर आए थे। उनके पिता अलाउद्दीन आजाद सवाई माधोपुर में कांग्रेस से विधायक थे। वे अक्सर पापा के साथ रहते थे। उनकी जीप चलाया करते थे। प्रशासन के इंतजामों के बीच दिलीप कुमार साहब उनकी जीप में सवार हुए। उनके साथ दुर्रु मियां और सामाजिक सद्भाव मंच के सभी धर्मों के बड़े चेहरे थे। इस सद्भावना रैली में करीब 10 हजार स्कूली बच्चों को शामिल किया। यह रैली कौमी एकता का संदेश और शांति से जीने की अपील के साथ दंगा प्रभावित इलाकों में घूमी। इसमें सबसे आगे दिलीप कुमार चले।

दिलीप कुमार का भाषण सुनकर लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे

पूर्व विधायक अलाउद्दीन आजाद ने बताया कि रैली खत्म होने के बाद एक स्कूल के बड़े मैदान में जनसभा हुई। जिसमें सैंकड़ों की संख्या में हर मजहब के लोग इकट्‌ठा हुए। इसमें दिलीप कुमार साहब का भाषण हुआ। जिसमें उन्होंने अपील करते हुए कहा कि ईश्वर कभी भी अपने बच्चों में भेदभाव नहीं करता है। उसने कभी भी प्राणी को बनाने में भेदभाव नहीं किया। सबको दो आंख, दो हाथ, दो पैर और दिमाग दिया। दिलीप कुमार ने कहा कि सूरज और चांद ने कभी भी रोशनी देने में हिंदू मुस्लिम नहीं देखा। कभी जाति धर्म देखकर प्रकाश नहीं दिया। वो सबको समान रूप से रोशनी देते हैं। नदियां सबको समान रूप से पानी देती है। पेड़-पौधे सभी के लिए छांव और फल देते हैं। इसको देने में धर्म और मजहब नहीं देखते हैं। इस तरह दिलीप साहब का यादगार भाषण था। उनकी बातों को सुनकर लोगों की आंखों में आंसू आ गए। इसके बाद शास्त्री नगर में शांति बहाल हो गई और दिलीप साहब एक दिन जयपुर में ठहर कर मुंबई लौट गए।

कई बार राजस्थान आए दिलीप कुमार

जोधपुर में मनाई थी अपनी 75वीं वर्षगांठ

जोधपुर फिल्म सिटी ने दिलीप कुमार की 75वीं वर्षगांठ पर 1993 में दिलीप कुमार फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया था। उस समय इस आयोजन का इनॉगरेशन करने दिलीप कुमार के साथ सायरा बान आई थीं। इस दौरान अशोक गहलोत भी मौजूद थे। इस फिल्म फेस्टिवल में दिलीप कुमार की मुगल ए आजम, मधुमती, देवदास जैसी 11 फिल्मों का शो किया गया था। 

अजमेर दरगाह भी आए थे दिलीप कुमार

अजमेर में शूटिंग अरेंजमेंट करने वाले बाबू भाई घोसी ने बताया कि पूर्व चिकित्सा मंत्री एतमाद उद्दीन खान दुरु मियां के साथ दिलीप कुमार हैदराबाद निवासी दूसरी पत्नी के साथ दरगाह जियारत को आए थे। प्रशंसकों की भीड़ ना हो इसके लिए यह व्यवस्था की गई थी कि उन्हें शाम को जियारत कराई जाएगी, लेकिन प्रशंसकों को दिलीप कुमार के आने की खबर लग चुकी थी। नतीजा दिलीप कुमार के आने से पहले ही प्रशंसकों का जमावड़ा दरगाह और दरगाह बाजार में लग चुका था। पुलिस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। दिलीप कुमार जब पहुंचे तो भीड़ काफी थी। बमुश्किल उन्हें जियारत के लिए ले जाया गया। 

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