द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईड़ी) जैसी जांच एजेंसियों की जांच की तलवार वर्षों तक किसी आरोपी के सर पर क्यों लटकी रहती हैग् उनका समय से निपटारा क्यों नहीं होता? खासकर सांसदों और विधायकों (पूर्व और मौजूदा) के खिलाफ दर्ज मामलों में जांच और सुनवाई की रफ्तार अत्यंत धीमी क्यों है? सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर चिंता जताते हुए पूछा है कि इन एजेंसियों ने आज तक इस बात की कोई वजह क्यों नहीं बताई? यदि कोई कमी है तो केंद्र सरकार को इन एजेंसियों को आवश्वक मानव संसाधन और बुनियादी ढøांचा उपलब्ध कराना चाहिए। कोर्ट का कहना था कि अनेक मामले 15 से 20 साल से लटके हुए हैं और उनमें आरोप पत्र तक दायर नहीं हुए हैं। जांच एजेंसियां कुछ नहीं कर रही हैंग् खासकर ईड़ी सिर्फ संपत्ति की कुर्की कर रहा है। इस मामलों को ऐसे ही लटका कर नहीं रखा जा सकताग् या तो चार्जशीट दाखिल हो या मुकदमे बंद कर देने चाहिए। अदालत को बताया गया कि 122 सांसदों और विधायकों के खिलाफ धन शोधन के केस दर्ज हैं। इनमें से 78 मामले 2019 से ही लंबित हैंग् जबकि सीबीआई ने भी 121 मामले दर्ज कर रखे हैं। कोर्ट का अवलोकन था कि सीबीआई जैसी जांच एजेंसी भी न्यायपालिका की तरह मामलों के बोझ से दबी हुई है। जांच एजेंसियां मानव संसाधन और आवश्यक बुनियादी ढøांचे की कमी से जूझ रही हैं। एक निचली अदालत भी 1000 मामलों को संभालती है। विशेष अदालतों को विशेष कानूनों के तहत खास मामलों की सुनवाई करने को कहा गया थाग् लेकिन कुछ भी नहीं हुआ है। न्याय मित्र का यह कहना भी गंभीर चिंता का विषय है कि जनप्रतिनिधियों के खिलााफ मामलों पर सीबीआई और ईड़ी की स्थिति रिपोर्ट परेशान करने वाली और चौंकाने वाली है। देखा जाए तो ऐसे मामलों का लंबित रहना सिर्फ मानव संसाधन और बुनियादी ढøांचे की कमी के कारण ही नहीं होता। सत्तारूढ़ सरकारों को भी यह देरी बहुत भाती है क्योंकि ऐसे मामलों में लिप्त सांसदों और विधायकों में हर पार्टी के लोग शामिल होते हैं। मामलों के लंबित रहने से राजनीति के बहुत से सूत्र उलझाए या सुलझाए जाते हैं। इसी कारण बहुत से राजनीतिज्ञों की सांसें ऊपर नीचे होती रहती हैं। इसी लिए तो विपक्षी राजनेता यदा-कदा सरकारों पर इन एजेंसियों के मनचाहे दुरुûपयोग के आरोप लगाते रहते हैं। न्यायपालिका को इस स्थिति पर भी गौर करना चाहिए। ॥

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