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 अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका की परख करेगा अमेरिका

अमेरिका ने पाकिस्तान की आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों की जो अनदेखी की उसके कारण ही उसे अफगानिस्तान में मुंह की खानी पड़ी। 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद ओसामा बिन लादेन समेत सारे तालिबानी सरगना पाकिस्तान में जा छिपे लेकिन अमेरिकी प्रशासन अनजान ही बना रहा।

अमेरिका ने पाकिस्तान की आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों की जो अनदेखी की उसके कारण ही उसे अफगानिस्तान में मुंह की खानी पड़ी। 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद ओसामा बिन लादेन समेत सारे तालिबानी सरगना पाकिस्तान में जा छिपे लेकिन अमेरिकी प्रशासन अनजान ही बना रहा। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का यह कहना महत्वपूर्ण तो है कि अमेरिका इसकी परख करेगा कि पाकिस्तान ने बीते दो दशकों में कैसी भूमिका निभाई है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अमेरिकी प्रशासन की ओर से ऐसी बातें पहले भी की गई हैं और सब जानते हैं कि उनका कहीं कोई नतीजा नहीं निकला। पिछले दो दशकों में अमेरिकी सत्ता में जो भी लोग रहे, वे इससे भली तरह अवगत रहे कि पाकिस्तान तरह-तरह के आतंकी संगठनों को केवल पालता-पोसता ही नहीं रहा, बल्कि अमेरिका की आंखों में धूल भी झोंकता रहा। वह एक ओर आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अमेरिका से आर्थिक एवं सैन्य सहायता लेता रहा और दूसरी ओर तालिबान, जैश और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों को पनाह भी देता रहा। इस आशय की न जाने कितनी खुफिया रपटों से अमेरिकी प्रशासन परिचित होता रहा, लेकिन उसने पाकिस्तान को उसके दोहरे रवैये के लिए कभी दंडित नहीं किया। अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने के नाम पर उसकी आर्थिक सहायता तो रोकी, लेकिन खूंखार आतंकी संगठनों को पनाह देने के लिए उसे कभी जवाबदेह नहीं बनाया। 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद ओसामा बिन लादेन समेत सारे तालिबानी सरगना पाकिस्तान में जा छिपे, लेकिन अमेरिकी प्रशासन अनजान ही बना रहा। अमेरिका ने पाकिस्तान के आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों की जो अनदेखी की, उसके कारण ही उसे अफगानिस्तान में मुंह की खानी पड़ी। अमेरिकी विदेश मंत्री का यह कथन कोई बहुत उम्मीद नहीं जगाता कि अमेरिका पाकिस्तान की भूमिका की जांच करेगा, क्योंकि यह सबके संज्ञान में है कि तालिबान उसकी ही मदद से वहां पर काबिज हुआ। यह भी किसी से छिपा नहीं कि पाकिस्तान ने तालिबान की जीत पर किस तरह खुशी जताई और किस प्रकार उसकी अंतरिम सरकार बनवाई। यदि इस अंतरिम सरकार में अनेक घोषित आतंकी मंत्री बन गए हैं तो पाकिस्तान के कारण ही। यह विचित्र है कि अमेरिका तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों को अलग-अलग करके देख रहा है, जबकि वे एक ही हैं और उन सबकी पीठ पर पाकिस्तान का हाथ है। अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनवाने के बाद पाकिस्तान इस कोशिश में है वे उसके ही हिसाब से सरकार चलाएं। बेहतर हो कि अमेरिका यह महसूस करे कि अफगानिस्तान में तालिबान के सहारे एक तरह से पाकिस्तान वहां पर काबिज हो गया है। इससे अफगानिस्तान में किस्म-किस्म के आतंकी संगठनों के फलने-फूलने का अंदेशा पैदा हो गया है। इस अंदेशे को दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि अमेरिका पाकिस्तान को दंडित करने पर गंभीरता से विचार करे।











समाज सेवा की आड़ में साजिश, मतांतरण के गंदे धंधे में विदेशी चंदे पर जरूरी है प्रहार

विदेशी मदद पाने वाले संगठन प्रकट रूप में तो सेवा का काम करते हैं पर ज्यादातर मतांतरण का धंधा चलाते हैं। केंद्रीय गृह मंत्रलय ने विदेशी चंदा पाने वाले आबतक नौ गैर सरकारी संगठनों का लाइसेंस रद कर चुका है।

हाल में केंद्रीय गृह मंत्रलय ने करीब छह गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के उस लाइसेंस को रद कर दिया, जिसके तहत वे विदेशी चंदा लेने के अधिकारी थे। इस तरह इस साल ऐसे गैर सरकारी संगठनों की संख्या नौ पहुंच गई है, जिनके विदेशी चंदे पाने वाले लाइसेंस को रद किया गया। इन संगठनों पर विदेश से मिले चंदे का दुरुपयोग करने, आय-व्यय का हिसाब न देने और मतांतरण में लिप्त होने जैसे गंभीर आरोप हैं। बीते कुछ सालों में इन्हीं कारणों से तमाम गैर सरकारी संगठनों के विदेशी चंदे हासिल करने वाले लाइसेंस रद किए गए हैं, लेकिन अभी भी ऐसे हजारों संगठन सक्रिय हैं। ऐसे संगठन प्रकट रूप में तो समाज सेवा का काम करते हैं, लेकिन ज्यादातर मतांतरण का गंदा धंधा चलाते हैं। वे विदेश से मिले पैसे का मनमाना इस्तेमाल करते हैं। जहां कुछ एनजीओ अपनी जेबें भरने का काम करते हैं, वहीं अन्य लोगों को बरगलाकर या फिर उनकी गरीबी और अज्ञानता का लाभ उठाकर उनका मत-मजहब बदलने का काम करते हैं। वैसे तो मतांतरण का धंधा पूरी दुनिया में चल रहा है, लेकिन अफ्रीका और एशिया के गरीब देश किस्म-किस्म के गैर सरकारी संगठनों के निशाने पर खास तौर से हैं। इनमें से बड़ी संख्या उनकी है, जो दूसरे मत-मजहब वालों को अपने मजहब में लाने को प्रतिबद्ध हैं। इनका मानना है कि लोगों का भला तभी होगा, जब वे मजहब विशेष के अनुयायी बनेंगे। जाहिर है कि ऐसे ज्यादातर संगठन ईसाइयत या इस्लाम से जुड़े हैं, क्योंकि इन्हीं दोनों मजहब के धर्म प्रचारक इस मानसिकता से लैस हैं कि केवल उनका मार्ग ही असली या फिर एकमात्र ऐसा मार्ग है, जिस पर चलकर ईश्वर को पाया जा सकता है या फिर जन्नत को हासिल किया जा सकता है। ये संगठन-समूह इस सनक से ग्रस्त हैं कि सारी दुनिया को अपने मजहब का अनुयायी बनाना है। इन संगठन-समूहों को कई देशों की सरकारें भी संरक्षण देने के साथ आर्थिक सहायता भी देती हैं। यदि कोई देश ऐसे संगठन-समूहों के खिलाफ कार्रवाई करता है तो वहां धार्मिक स्वतंत्रता के खतरे में होने का झूठा प्रचार किया जाता है। इस काम में तथाकथित मानवाधिकार संगठन भी भागीदार बनते हैं। भारत में मतांतरण में लिप्त संगठनों का काम इसलिए आसान बना हुआ है, क्योंकि भारतीय संविधान सभी मतावलंबियों को अपने मत-मजहब का प्रचार करने का अधिकार देता है। इस अधिकार में कोई समस्या नहीं। समस्या इसमें है कि इसका जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है। इस दुरुपयोग का उदाहरण है पूवरेत्तर भारत के साथ-साथ देश के आदिवासी बहुल इलाके। इन इलाकों में बड़ी संख्या में दलितों और आदिवासियों का मतांतरण वैसे ही गैर सरकारी संगठनों की ओर से किया जा चुका है, जैसे कुछ संगठनों पर रह-रहकर पाबंदी लगाने का सिलसिला कायम है। मतांतरण में लिप्त संगठन कितने दुस्साहसी हैं, इसका एक प्रमाण है कुछ माह पहले उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से उस इस्लामिक दावा सेंटर का भंडाफोड़, जो मूक-बधिर छात्रों को मतांतरित करने में लगा हुआ था। ऐसे ही तमाम संगठन ईसाई मिशनरियों की शक्ल में सक्रिय हैं। ये इतने ढीठ हैं कि लोगों को बरगलाने के लिए हिंदू देवी-देवताओं की आड़ लेने में भी संकोच नहीं करते। ऐसे संगठन अब सारे देश में सक्रिय हैं। उनकी अवांछित सक्रियता से सरकारें अच्छी तरह अवगत हैं, लेकिन वे कुछ करने से बचने में ही अपनी भलाई समझती हैं। यह खतरनाक प्रवृत्ति है, क्योंकि मतांतरण अभियान कुल मिलाकर राष्ट्रांतरण का काम कर रहा है। जब कभी मतांतरण में लिप्त तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की बात उठती है तो खुद को सेक्युलर-लिबरल कहने वाले सक्रिय हो उठते हैं। ऐसे लोग तब भी सक्रिय हो जाते हैं, जब कोई संगठन घर वापसी की बात करता है। जिन सेक्युलर-लिबरल तत्वों को छल-छद्म से चल रहे मतांतरण अभियानों से कोई समस्या नहीं होती, वे घर वापसी जैसे कार्यक्रमों पर आपत्ति जताते हैं। यही नहीं, वे दलितों और आदिवासियों को हिंदू न मानने की वकालत करने वालों का साथ देते हैं। यह ऐसे तत्वों की सक्रियता का प्रमाण है कि अब मीडिया के एक हिस्से में ऐसा विमर्श दिखाई देने लगा है कि किस क्षेत्र में कितने हिंदू, मुसलमान और दलित एवं आदिवासी हैं। यह और कुछ नहीं दलितों और आदिवासियों को हिंदू समाज से अलग बताने का कुचक्र है। मतांतरण में लिप्त तत्व इसलिए बेलगाम हैं, क्योंकि अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक एवं शिक्षा संस्थानों को अपने हिसाब से संचालित करने का अधिकार है। इस अधिकार का भी बेजा इस्तेमाल हो रहा है। यह अधिकार बहुसंख्यकों को प्राप्त नहीं है और इसी कारण यह मांग उठती रहती है कि मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त किया जाए। ज्ञात हो कि देश के ज्यादातर बड़े मंदिरों का प्रबंधन सरकारों की ओर से किया जाता है। उनके चंदे और चढ़ावे का पैसा सरकारी कोष में जाता है। इसका कहीं कोई औचित्य नहीं कि अपने धार्मिक स्थलों और शिक्षा संस्थानों के प्रबंधन का जैसा अधिकार अल्पसंख्यकों को हासिल हो, वैसा बहुसंख्यकों को न हो, लेकिन यह अंधेरगर्दी जारी है। इसके बाद भी यह कहा जाता है कि भारतीय संविधान की निगाह में सभी बराबर हैं। यह निरा झूठ है। सच यह है कि हमारा संविधान समानता के सिद्धांत की घोर अनदेखी करता है। पता नहीं क्यों संसद, सरकार और सुप्रीम कोर्ट को यह विसंगति दिखाई नहीं देती। यह विसंगति शिक्षा अधिकार कानून में भी नत्थी हो गई है। माना जाता है कि इसी कारण हिंदू समाज का अंग माने जाने वाले जैन समाज ने खुद को अल्पसंख्यक घोषित किए जाने की पहल की। एक तरह से भारतीय संविधान ही भारतीय समाज के विघटन-विखंडन को बढ़ावा दे रहा है।






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अफगानिस्तान में बदले हालात के हिसाब से सही दांव चलना भारत सरकार के लिए टेढ़ी खीर

भारत के लिए अफगानिस्तान मात्र विदेश नीति का ही एक मामला नहीं बल्कि हमारे लिए उसके कई घरेलू निहितार्थ भी हैं। अफगानिस्तान में बदले हालात के हिसाब से सही दांव चलना भारत सरकार के लिए टेढ़ी खीर है

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी तो सुनिश्चित थी, पंरतु वह जिस अप्रत्याशित एवं औचक तरीके से हुई उसने पूरे विश्व को हैरत में डाल दिया। आज समूचा अफगानिस्तान अराजकता की भेंट चढ़ा है। यह हमारे दौर की सबसे बड़ी मानवीय आपदाओं में से एक है। इसकी तुलना वियतनाम से अमेरिकी पलायन से की गई, परंतु इस संकट का दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है। काबुल की देहरी पर तालिबान की दस्तक के साथ ही अफगान सरकार घुटनों के बल आ गिरी। भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अफगानिस्तान में मचे बवाल के कारण दुनिया के तमाम देश वहां से अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी को लेकर चिंतित हो उठे। काबुल एयरपोर्ट के नजदीक बम धमाकों से सुरक्षित वापसी की राह में भी अड़ंगे लगने लगे। इन परिस्थितियों में भारत के समक्ष चुनौतियां कई गुना बढ़ गईं। भारत के लिए अफगानिस्तान मात्र विदेश नीति का ही एक मसला नहीं, बल्कि हमारे लिए उसके कई घरेलू निहितार्थ भी हैं। जहां पश्चिमी जगत की अफगानिस्तान के साथ रणनीतिक सक्रियता हालिया दौर की ही बात है वहीं अफगान के साथ हमारे संबंध सदियों पुराने हैं। यह चिरकाल से हमारे विस्तारित पड़ोस का अहम हिस्सा रहा है। अफगानिस्तान में हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों की ठीक-ठाक आबादी थी। भारतीय कंपनियां वहां बुनियादी ढांचे से जुड़ी तमाम परियोजनाओं पर काम कर रही थीं। उनमें कार्यरत तमाम कामगार वहां फंस गए। भारत सरकार ने उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित कराई। इसी के साथ-साथ अफगानिस्तान से अपने ऐतिहासिक रिश्तों को देखते हुए हमने अफगान शरणार्थियों से भी मुंह नहीं मोड़ा। देश में महामारी के प्रकोप और अपने संसाधनों पर पहले से ही कायम दबाव के कारण अफगान लोगों को शरण देना आसान नहीं था। वास्तव में अतिथि देवो भव: और वसुधैव कुटुंबकम जैसे अपने मूल भावों के कारण हम मुसीबत में फंसे लोगों से मुंह मोड़ ही नहीं सकते। भारत जैसे विविधितापूर्ण और विशाल देश में अफगान संकट पर सरकार के रुख-रवैये को लेकर तमाम राय-मशविरे आए। एक बहस यह छिड़ी कि क्या भारत अफगान अल्पसंख्यकों जिनमें मुख्य रूप से हिंदू और सिख शामिल हैं, को ही वापस लाए या फिर बिना किसी धार्मिक आधार के शरण चाहने वाले सभी लोगों को आसरा दे। इस संदर्भ में कुछ लोगों ने नागरिकता संशोधन विधेयक यानी सीएए जैसे संवेदनशील मुद्दे का शिगूफा भी छेड़ा। अच्छी बात यह रही कि इसे लेकर विवाद छेड़ने की कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं, क्योंकि लोगों को जल्द समझ आ गया कि सरकार का रुख सुसंगत और पारदर्शी है। हालांकि, सुरक्षा के मोर्चे पर कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शरण देने की आड़ में कुछ आतंकी तत्वों के देश में पैठ बनाने को लेकर चिंता वाजिब है। फिलहाल सबसे ज्यादा विचलित करने वाली बातें फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे कश्मीरी नेता कर रहे हैं। तालिबान की ताजपोशी का स्वागत कर और भारत सरकार को उससे संवाद की सलाह देकर उन्होंने एक तरह से अपनी मर्यादा रेखा लांघी। महबूबा मुफ्ती ने तो एक कदम आगे बढ़कर अफगानिस्तान और कश्मीर को एक ही तराजू में तौल दिया। यह न केवल आपत्तिजनक, अपितु भारत की आंतरिक राजनीति के लिए भी विध्वंसक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पश्चिमी जगत से लेकर पूरब में रूस और चीन जैसी शक्तियों के उलट अफगानिस्तान में भारतीय हितों की प्रकृति कुछ अलग है। इसमें पाकिस्तान की मौजूदगी और तालिबान के साथ उसके संदिग्ध रिश्तों से सामरिक कोण बनता है। वहीं भारतीयों के दिलों में अफगान लोगों के लिए एक खास कोना है। इससे इनकार नहीं कि ऐतिहासिक रिश्तों के अलावा भारत की एक बड़ी आबादी विशेषकर उत्तर भारत में इस्लाम दोनों देशों के बीच एक साझा कड़ी रही है। एक ऐसे दौर में जब अफगानिस्तान के बदलते घटनाक्रम को लेकर निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता और इस्लामिक देश भी असमंजस में हैं तब हमारा रुख अभी तक सधा हुआ रहा है। ऐसे में नेताओं या सरकार के किसी बेमौका बयान के अनपेक्षित परिणाम सामने आ सकते हैं। इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संदर्भ आगामी विधानसभा चुनाव विशेषकर उत्तर प्रदेश का है। यह ईमानदार स्वीकारोक्ति करनी होगी कि चुनावों के दौरान सांप्रदायिक विभाजक रेखाएं बहुत गहरी हो जाती हैं। ऐसे में अगर नेता अफगानिस्तान संकट से मतदाताओं के ध्रुवीकरण और सियासी लाभ उठाने की जुगत भिड़ाएंगे तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वैसे भी तालिबान की भारतीय मुस्लिमों या हिंदू के किसी वर्ग से कोई भी तुलना, जिसमें कुछ लोग लगे भी हुए हैं, हमारे राष्ट्रीय चरित्र के प्रतिकूल होगी। हमारी पहचान अत्यंत विशिष्ट है, जिसे किसी आयातित विचारधारा द्वारा आसानी से प्रभावित नहीं किया जा सकता। हमें इस धारणा के साथ दृढ़ रहना होगा कि किसी धार्मिक आधार पर सबको एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हालांकि, इसका यह अर्थ भी नहीं कि हम वास्तविक आतंकी खतरों को लेकर आंखें मूंदकर अपने रक्षा कवच को कमजोर कर लें। यह एक तथ्य है और अतीत का हमारा अनुभव भी यही पुष्ट करता है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के कुछ हिस्सों में विदेशी तत्वों ने अपनी गहरी पैठ बनाई है। चुनाव और त्योहारी सीजन उनके हमलों के लिए माकूल मौका हो सकता है। कश्मीर में हालात धीरे-धीरे ही सही, लेकिन सामान्य होने की सूरत में लौट रहे हैं। वहां चुनाव भी होने हैं। ऐसे में अलगाववादी तो इस प्रक्रिया में गतिरोध पैदा करने की फिराक में ही होंगे। हम उन्हें कोई मौका देना गवारा नहीं कर सकते। अफगानिस्तान में बदले हालात के हिसाब से अपने लिए सही दांव चलना भारत सरकार के लिए टेढ़ी खीर है। चीन और पाकिस्तान भी अफगानिस्तान के इस भंवर में अपनी नैया पार लगाने में लगे हैं। इसके न केवल दीर्घकालिक सामरिक, बल्कि आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा के लिए भी गहरे निहितार्थ होंगे। साथ ही इससे नई वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका भी निर्धारित होगी। ऐसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर हमारे घरेलू कारकों द्वारा सरकार को किसी भी प्रकार विचलित नहीं करना चाहिए। हम एकता के जरिये ही इस कड़ी चुनौती से पार पा सकते हैं।











बचाव की मुद्रा में नौजवान 

साल 2018 में मैंने अपनी किताब के लिए आज के नौजवानों की आर्थिक आकांक्षाओं, उनके सामाजिक विचार और राजनीतिक नजरिये पर शोध करना शुरू किया। मेरा मकसद साफ था। मैं उन लोगों को समझना चाहता था, जिनको हमने बहुत ज्यादा नहीं सुना है। आखिर देश के छोटे कस्बों और  शहरों में रहने वाले युवा भारत के भविष्य में अपनी जगह कहां देखते हैं? वाकई, अपने देश में काफी ज्यादा विविधता है और नौजवान भी इसके अपवाद नहीं हैं। हालांकि, भाषायी, सांस्कृतिक-धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर खासा अंतर होने के कारण इस पीढ़ी का एकजुट समूह के रूप में अध्ययन काफी मुश्किल हो सकता है, पर एक सामान्य सूत्र जो भारत के नौजवानों को एक करता है, वह है अपने भविष्य को लेकर उनकी चिंता। अपनी पुस्तक लिखते समय मैंने 13 राज्यों में 900 से अधिक नौजवानों से बात की। मैंने बेशक उनमें परस्पर विरोधी विचार और अनुभव देखे, लेकिन जिस एक बात से मैं खासा प्रभावित हुआ और जिसने मेरे उत्तरदाताओं को एक-दूसरे से जोड़ा, वह बात है अपने आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक विकल्पों को लेकर महत्वाकांक्षी होते हुए भी वे इधर-उधर भागने के बजाय स्थिरता को तवज्जो देना चाहते हैं। अच्छी तनख्वाह वाली निजी क्षेत्र की नौकरियों की कमी के कारण उनकी आर्थिक चिंता न सिर्फ उनकी अपनी सफलता की राह में बड़ी बाधा है, बल्कि देश के सुखद भविष्य के लिए भी ठीक नहीं है। बेरोजगार युवा पांच या दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की राह में राष्ट्र-निर्माता साबित नहीं होंगे। कोविड-19 से पहले देश में बेरोजगारी दर 45 साल के अपने उच्चतम स्तर पर थी, और हमने तकरीबन हरेक सप्ताह खबरों में देखा था कि किस तरह लाखों उच्च शिक्षित युवा रेलवे में चपरासी स्तर या सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए आवेदन कर रहे थे। इनमें से कई तो पीएचडी, एमबीए या बीटेक पास थे और उन पदों के लिए वे आवेदन कर रहे थे, जिनके लिए दसवीं पास आवेदकों की दरकार थी। ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) के एक युवा सर्वे में हर तीन में से दो भारतीय नौजवानों ने रोजगार के लिहाज से सरकारी नौकरी को तवज्जो दी है। अपने शोध के दौरान मैं भी अनगिनत ऐसे नौजवानों से मिला, जिन्होंने अपने जीवन का अच्छा-खासा वक्त संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं या राज्य-स्तरीय प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में खर्च किया है। कई तो जैसे-तैसे कोई भी सरकारी नौकरी हासिल करना चाहते थे, क्योंकि यह स्थिर और टिकाऊ होती है। जाहिर है, भारतीय अर्थव्यवस्था निजी क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित रोजगार पैदा नहीं कर रही है, और कई नौजवानों को टिकाऊ रोजगार की तलाश में सरकारी क्षेत्र की ओर मुंह तकने को मजबूर किया जा रहा है। 1991 के उदारीकरण ने एक मजबूत सेवा क्षेत्र का निर्माण जरूर किया है, लेकिन यह हर साल देश के श्रम-बल में शामिल होने वाले लाखों युवाओं का बहुत मामूली हिस्सा भी नहीं संभाल पा रहा।  आर्थिक निश्चिंतता न होने के कारण भारतीय युवा अपने निजी जीवन को स्थिर बनाना चाहते हैं। 21वीं सदी में भी ‘अरेंज्ड मैरिज’, यानी माता-पिता द्वारा तय शादी का एक मजबूत संस्था के रूप में बने रहना इसकी पुष्टि करता है। सीएसडीएस युवा सर्वे में पाया गया है कि 10 में से आठ से अधिक (84 फीसदी)  विवाहित भारतीय युवाओं ने अरेंज्ड मैरिज की थी, जबकि प्रेम विवाह करने वालों की संख्या महज छह प्रतिशत थी। हिंदी फिल्में भले ही कुछ और कहानी बयां करें, लेकिन ज्यादातर भारतीय युवा खुद अपना जीवनसाथी नहीं तलाशते। इनमें से कुछ तो सामाजिक दबाव के कारण ऐसा नहीं करना चाहते, जबकि अधिकांश अच्छे वेतन व टिकाऊ रोजगार की कमी और आर्थिक अस्थिरता के कारण खुद को इतना सक्षम नहीं पाते कि प्यार की खोज कर सकें। स्थिरता की यह इच्छा अंतत: ईवीएम में व्यक्त होती है। मतदान के आंकडे़ बताते हैं कि भारतीय नौजवान भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे अधिक समर्थन करते हैं। आर्थिकी को तवज्जो देने वालों को संभवत: यह बात गलत लगेगी, लेकिन सच यही है कि जो नेता ऐसे मजबूत भारत का वादा करते हैं, जो अपने दुश्मनों (आंतरिक और बाहरी) के खिलाफ मजबूती से खड़ा होगा, उसके छोटे शहरों और गांवों में चुनाव जीतने की संभावना बढ़ जाती है। साल 2019 का आम चुनाव इसको समझने का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह बढ़ती बेरोजगारी और पाकिस्तान के साथ सीमा पर झड़प के बीच आयोजित किया गया था। युवा भारतीयों को यह बताने पर कि कौन उनको अच्छी सुरक्षा देगा और बाहरी दुनिया से बचाएगा, नौकरियों की कमी का मुद्दा कमजोर पड़ता गया। चुनाव बाद के सर्वे बताते हैं कि 18 से 35 आयु वर्ग के लगभग 40 फीसदी मतदाताओं ने भाजपा का साथ दिया, जो पार्टी के राष्ट्रीय वोट शेयर से लगभग चार अंक अधिक है। अपने साक्षात्कारों में मैंने पाया कि इनमें से कई युवा मतदाता मोदी के व्यक्तित्व से प्रभावित थे। उनके लिए वे पिता समान आदरसूचक शब्द बोल रहे थे, जो एक अस्थिर दुनिया में निजी तौर पर उनकी देखभाल करेंगे। वास्तविक आर्थिक तरक्की, जिसके जाहिर होने में कई साल लग जाते हैं, उतनी महत्वपूर्ण बात नहीं लग रही थी, जितनी स्थिरता की खोज। स्पष्ट है, भारतीय नौजवान अभी रक्षात्मक मुद्रा में हैं। वे एक ऐसी अर्थव्यवस्था में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं, जो पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर रही है, पर उनके रहन-सहन का खर्च लगातार बढ़ा रही है। नतीजतन, वे 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था और विश्व व्यवस्था का फायदा उठाने के बजाय बैकफुट पर लड़ रहे हैं। यह एक दुश्चक्र है, जहां युवाओं का कीमती समय अधिकतम क्षमता व भविष्य का फायदा उठाने के बजाय बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में जाया हो रहा है। यदि यही स्थितियां बनी रहीं, तो भारत के लिए अपनी युवा जनसांख्यिकी, जिसे जनसांख्यिकीय लाभांश भी कहा जाता है, का फायदा उठाना और पांच से दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना कठिन हो जाएगा। आर्थिक अनिश्चितता का असर व्यापक हो गया है, जो एक पूरी पीढ़ी के विकास और उसकी क्षमता को प्रभावित कर सकती है। हमें ऐसा नहीं होने देना चाहिए।














विश्वेश्वरैया जयंती, इंजीनियर्स डे: अद्भुत, अकल्पनीय अभियांत्रिकी से दमकता नया भारत

एफिल टावर ,स्टेचू ऑफ लिबर्टी की ऊंचाइयों को अब भूल जाइए। गगनचुंबी ऊंचाइयों पर अभियांत्रिकी को देखना है तो कश्मीर की वादियों में आइए, केवडिया में मां नर्मदा के तट पर पहुंचिए, यहां नए भारत की मेधा, कौशल और इंजीनियरिंग आपको नए संकल्पों से रु-ब-रु कराते मिलेंगे। बहुत पुरानी बात नहीं है जब सरहद पर मीटरों के फासले दिनों में तय हो पाते थे। आज किलोमीटरों का सफल मिनिटों में पूरा हो रहा है। इंच-इंच रास्ता संघर्ष को आमंत्रित करता था। अब मीलों की सुरंग भारत की संप्रभुता,सम्मान और सक्षमता की कहानी बयां कर रहीं है। यह नया भारत है। अपनी सीमाओं की चौकसी में खड़ा हर दुश्मन की आंख में आंख डालकर चुनौती को स्वीकार करने। दरअसल, यह भारत की अद्धभुत इंजीनियरिंग का नया अध्याय भी है, जिसे देखकर पूरी दुनिया चकित है। एफिल टावर ,स्टेचू ऑफ लिबर्टी की ऊंचाइयों को अब भूल जाइए। गगनचुंबी ऊंचाइयों पर अभियांत्रिकी को देखना है तो कश्मीर की वादियों में आइए, केवडिया में मां नर्मदा के तट पर पहुंचिए, यहां नए भारत की मेधा, कौशल और इंजीनियरिंग आपको नए संकल्पों से रु-ब-रु कराते मिलेंगे। हजारों साल पहले जिस वास्तु और विनिर्माण तकनीकी से हमारे पूर्वजों ने, मठ मंदिर,किलों की स्थापत्य कला से दुनिया को परिचित कराया था, कमोबेश आज 21वीं सदी में भी भारतीय इंजीनियरिंग के नायाब कौशल की अनेक ऐसी ही कहानियां लिखी जा रही है। आज विश्व की सबसे लंबी टनल हो या सबसे ऊंची प्रतिमा या फिर सबसे ऊंचा रेल पुल सब कुछ भारत के नाम पर है। यह भारत की महान एवं विज्ञान सम्मत इंजीनियरिंग विरासत को पुनर्प्रतिष्ठित करने जैसा भी है। आज हमारी अभियांत्रिकी का सिक्का दुनिया को अचंभित कर रहा है। यह सब हो रहा है। सरकार ने भारतीय प्रतिभा को प्रतिष्ठित करने के अतिरेक प्रयासों को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा हुआ है। 3428 किलोमीटर लंबी भारत की एलएसी पर आज कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा है जहां पहुंचने के लिए हमारी सेनाओं को मौसम खुलने का इंतजार करना पड़े। सब दूर सड़कों, पुलों, सुरंगों का ऐसा संजाल सरकार ने खड़ा कर लिया है, जो दुश्मन देशों को बुरी तरह खटक रहा है। यह सब आज से 10 बर्ष पहले तक असंभव सा लगता था और तथ्य यह है कि तत्कालीन सरकारों की प्राथमिकता से बाहर ही था। कभी केंद्रीय रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने सदन में खड़े होकर स्वीकार किया था- सीमावर्ती इलाकों में आधारभूत सरंचना विकास हमारी सामरिक नीति का हिस्सा नही है। यानी एक लिहाज से देखा जाए तो सीमाओं पर विकास में कांग्रेस की कोई रुचि नहीं थी। नतीजतन 1997 में सयुंक्त मोर्चा सरकार के समय तबके प्रधानमंत्री श्री एचडी देवगौड़ा ने असम-अरूणाचल को जोड़ने वाले जिस "बोगीवील पुल" का भूमिपूजन किया था उसे 2014 तक ठंडे बस्ते में पटककर रखा। इधर 5920 करोड़ की लागत वाले इस पुल को मोदी सरकार ने अपनी प्राथमिकता में लेकर रिकार्ड समय में पूरा कर दिखाया। 4.94किलोमीटर का यह पुल भारत के इंजीनियरों की अदम्य औऱ अद्धभुत क्षमताओं का उदाहरण भी है। असम के डिब्रूगढ़ से अरुणाचल प्रदेश के धकोजी जिले को जोड़ने वाले इस पुल पर आपातकाल में लड़ाकू विमान तक उतारे जा सकते है। हमारे इंजीनियर्स ने इसे कुछ इस तरह डिजाइन किया है कि भूकंप औऱ बाढ़ जैसी आपदाओं में भी यह अगले 120 बर्षों तक यूं ही खड़ा रहेगा। पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी के जन्मदिवस पर तीन साल पहले प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया था।इस पुल ने न केवल असम और अरुणाचल को जोड़ दिया बल्कि चीन की सीमा तक रसद औऱ सेना भेजना मिनिट में संभव कर दिया है। इस डबल डेकर पुल के ऊपरी तल पर तीन लेन सड़क एवं निचले तल पर ट्रेन का ट्रेक बनाया गया है। जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में यह पुल बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के इंजीनियरों ने बनाया है वह भारतीय इंजीनियरिंग कौशल का अचंभित कर देना वाला पक्ष है। सीमा पर घात लगाए बैठे ड्रैगन के लिए तो यह किसी सदमे से कम नहीं है। देश के इंजीनियर्स का यह कमाल यहीं तक सीमित नही है, बल्कि सामरिक महत्व के हर उस हिस्से में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है जो भारत की सम्प्रभुता,एकता और सीमाई अखण्डता के लिए संवेदनशील माने जाते रहे हैं। दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल कश्मीर के रियासी में बन कर तैयार हो गया है। ये दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ब्रिज जो कि एफ़िल टॉवर से भी 35 मीटर ऊंचा है. इसकी नदी तल से ऊंचाई 359 मीटर है।कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है इसे रेलवे लाइन के माध्यम से भी सिद्ध किया जाना एक सपने जैसा था लेकिन हमारे इंजीनियर्स ने इस सपने को भी अब पूरा कर दिखाया है। इस रेल लाइन से सेना को कश्मीर घाटी तक पहुंचने में 4 से 5 घंटे की बचत होगी। इस खबर से चीन काफ़ी परेशान हो रहा है। ये ब्रिज जम्मू कश्मीर के रियासी ज़िले में बना है। भारत का चिनाब ब्रिज एफ़िल टॉवर से भी ऊंचा है। स्ट्रेटजिक महत्व के इस ब्रिज के बन जाने से अब पूरी कश्मीर घाटी देश बाक़ी हिस्सों से जुड़ गई है। ये ब्रिज जम्मू के ऊधमपुर से लेकर कश्मीर के बारामूला तक बन रही रेल लाईन यूएसबी आरएल प्रॉजेक्ट का हिस्सा है। इस रेल लाईन के बन जाने से भारतीय सेना को भारत चीन बॉर्डर तक पहुंचने में न सिर्फ़ सहूलियत होगी बल्कि चार से पांच घंटे की बचत भी होगी। इस ब्रिज को बनाने के लिए भारतीय रेलवे के इतिहास की अब तक की इस सबसे ऊंची क्रेन का इस्तेमाल किया गया है। इससे, आसमान में क्रेन के रोपवे से लटक कर जाते भारी स्टील के ब्रिज सेग्मेंट अपनी निर्धारित सटीक जगह पर रखना हमारे इंजीनियर्स की अद्धभुत क्षमताओं औऱ निपुणता का उदाहरण है। अब रेल लाईन का ये डेक आगे बढ़ेगा और चिनाब आर्च के ऊपर बन रहे पुल से जुड़ जाएगा जिसके ऊपर रेल लाईन बिछाई जाएगी। 28 हज़ार करोड़ रुपये के इस प्रॉजेक्ट से कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश रेलवे लाईन से जुड़ जाएगा। 272 किलोमीटर की इस रेल लाईन परियोजना को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है। कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड के सीएमडी संजय गुप्ता के अनुसार- ये रेल लाईन हिमालय की शिवालिक पर्वत माला और मध्य हिमालय की पीर पंजाल श्रंखला के सबसे दुर्गम इलाक़े के बीच से पार हो रही है। 272 किलोमीटर की इस रेल लाईन परियोजना में 38 सुरंगें और 97 ब्रिज हैं। रेलवे का दावा है कि किसी आतंकवादी ब्लास्ट के हमले में भी इसे नुक़सान नहीं होगा। एक स्पान ध्वस्त हो जाने पर भी ये काम करता रहेगा। इस पर 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से ट्रेन चलेगी। 266 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलने वाली हवा को भी ये बर्दाश्त कर सकता है। इसकी अनुमानित उम्र 120 वर्ष है। 584 किलोमीटर की वेल्डिंग इसमें हुई है। इसका स्टील -10 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान को सहने के योग्य है। पुल के निर्माण में 28,660 मिट्रिक टन स्टील लगी है। चिनाब आर्च में स्टील के बक्से हैं जिसमें स्थिरता के लिए कंक्रीट भरा गया है। आर्च का कुल वज़न 10,619 मिट्रिक टन है। मुख्य आर्च स्पैन की लम्बाई 467 मीटर वर्टिकल है और 550 मीटर हॉरिज़ॉंटल है। चिनाब ब्रिज की कुल लम्बाई 1.315 किलोमीटर है।मार्के वाली बात यह भी है कि 2003 में शुरु हुआ यह काम बीच में ही रुक गया था लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इसे राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित कर फिर से आरम्भ कराया और देश के इंजीनियरों ने इसे साकार भी कर दिया। सामान्य ज्ञान की किताबों में पढ़ी जाने वाली विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी,स्प्रिंग टेम्पल अब ऊंचाई के लिहाज से किताबों में नही होंगी,क्योंकि भारत के इंजीनियरों ने अपने पुरुषार्थ से गुजरात के केवडिया में 182 मीटर ऊंची सरदार पटेल की प्रतिमा निर्मित की है यह न्यूयॉर्क में लगी 93 मीटर ऊंची स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुनी ऊंची है। इस मूर्ति के निर्माण में चार धातुओं का इस्तेमाल किया गया है, जिससे सालों तक जंग का खतरा नही है। 5700 मीट्रिक टन स्ट्रक्चरल स्टील औऱ 18500 मीट्रिक टन रिइनफोर्समेंट बार्स के अलावा 22500 मीट्रिक टन सीमेंट से बनी इस ऐतिहासिक प्रतिमा को 44 महीने के रिकॉर्ड समय में 2500 इंजीनियर एवं 4076 श्रमिकों ने बनाया है। यह हमारी इंजीनियरिंग का अनूठा नमूना भी है कि रिक्टर स्केल 6.5 तीव्रता भूकम्प भी इस प्रतिमा को नुकसान नहीं कर सकता है। मुंबई में छत्रपति शिवाजी महाराज की 210 मीटर ऊंची प्रतिमा को बनाने के काम में भी भारत के इंजीनियर दिनरात जुटे हुए है। चीन के स्प्रिंग टेम्पल में लगी बुद्ध की प्रतिमा 153 मीटर ऊंची है जिसे सबसे बड़ी बुद्ध मूर्ति कहा जाता है। अब भारत के इंजीनियरों ने 210 मीटर ऊंची शिवाजी की मूर्ति का संकल्प लिया है। 4000 करोड़ से बनने वाली यह प्रतिमा औऱ संग्रहालय असल सिर्फ ऊंचाई भर के महत्व की नही है यह भारत के इंजीनियरों के ऊंचे जज्बे औऱ क्षमताओं का वैश्विक प्रदर्शन भी है। इधर 2009 से लंबित पड़ी कोलकोता में प्रस्तावित अंडर रिवर मैट्रो रेल परियोजना का निर्माण मोदी सरकार के कार्यकाल में भारतीय इंजीनियरिंग का एक औऱ नायाब उदाहरण बना है। 17500 फिट की ऊंचाई पर 80 किलोमीटर की यह सड़क बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के इंजीनियरों के कौशल का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसके निर्माण ने चीन की सीमा पर हमारी सतत् निगरानी को सुनिश्चित तो किया ही है साथ ही कैलाश मानसरोवर की दुर्गम यात्रा को भी सरल बना दिया है। 2005 में इस प्रोजेक्ट को स्वीकृति मिली थी लेकिन इसका काम आरंभ हुआ 2018 में जब कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता वाले प्रोजेक्ट में शामिल करते हुए 440 करोड़ रुपए स्वीकृत किए। 2022 तक इसे पूरा किया जाना था, लेकिन देश के इंजीनियर्स ने इसे समय से पहले ही बना दिया। यह सड़क धारचूला को लिपूलेख (चीन बॉर्डर) से जोड़ती है। इस परियोजना "हीरक"के चीफ इंजीनियर विमल गोस्वामी के अनुसार- सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस मार्ग के बन जाने से तवाघाटी के पास मांगती शिविर से शुरू होकर व्यास घाटी में गूंजी और सीमा पर भारतीय भू-भाग में स्थित सुरक्षा चौकियों तक के 80 किलोमीटर से अधिक के दुर्गम हिमालयी क्षेत्र तक पहुंचना आसान हो गया है। इस नए मार्ग से की जाने वाली कैलाश मानसरोवर की यात्रा का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा भारत में है,केवल 16 फीसदी ही चीन में पड़ता है जबकि सिक्किम,काठमांडू मार्ग से जाने पर 80 फीसदी हिस्सा चीन में पड़ता था। खास बात यह भी है कि अब चीन के पांच किलोमीटर क्षेत्र को छोड़कर सम्पूर्ण यात्रा वाहनों से हो रही है।कैलाश का महत्व हिंदुओं के अलावा बौद्ध,जैन तिब्बतियों के लिए भी है। भारतीय इंजीनियरिंग ने इस यात्रा को भी अपने कौशल से सुगम्य बना दिया है।


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राहुल गांधी का दौरा और कश्मीरी पंडितों की घर वापसी का सवाल

इस बार करीब 30 साल बाद जन्माष्टमी पर कश्मीर के कई इलाकों में झांकी निकाली गई। कुछ इलाकों में इन झांकियों में मुसलमानों ने भी हिस्सा लिया। एक बड़ा बदलाव कश्मीर के गुमनाम हो चुके नायकों को फिर से सम्मान देने का भी हुआ है।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी हाल ही में जब जम्मू आए, तो उन्होंने अपनी जड़ें कश्मीर में होने का खासतौर पर उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मेरा परिवार भी कश्मीरी पंडित है, मैं विश्वास दिलाता हूं कि कश्मीरी पंडितों की मदद करूंगा। राहुल गांधी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि कश्मीरी पंडितों से उनका पुराना जुड़ाव है। हालांकि उनकी पार्टी की सरकारों ने कभी अपने ही देश में विस्थापित होने का दंश झेल रहे कश्मीरी पंडितों की 'घर वापसी' के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया। फिर ऐसा क्या हुआ कि राहुल के मन में कश्मीरी पंडितों के लिए करुणा जाग गई? दरअसल, अनुच्छेद-370 हटने और राज्य का दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजन के बाद जम्मू-कश्मीर में बदलाव की बयार बह रही है। इसे देखकर उम्मीद बंधी है कि कश्मीरी पंडित जल्द अपने घर लौट सकते हैं। ऐसे में, कोई भी दल यह नहीं चाहेगा कि वह इस ऐतिहासिक घटना के विरोध में खड़ा दिखे। 'घर वापसी' की उम्मीद जागने की कई वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह है, बदला हुआ माहौल। इस बार करीब 30 साल बाद जन्माष्टमी पर कश्मीर के कई इलाकों में झांकी निकाली गई। कुछ इलाकों में इन झांकियों में मुसलमानों ने भी हिस्सा लिया। एक बड़ा बदलाव कश्मीर के गुमनाम हो चुके नायकों को फिर से सम्मान देने का भी हुआ है। हाल ही में श्रीनगर में जीरो ब्रिज से बक्शी स्टेडियम तक जाने वाली सड़क का नाम कश्मीर के प्रथम साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता और सुविख्यात कवि जिंदा कौल के नाम पर किया गया है। नायकों को सम्मान देने की इस कड़ी में दूसरा फैसला हैदरपोरा के डिग्री कालेज का नाम मशहूर थिएटर कलाकार पद्मश्री मोतीलाल केमू के नाम पर रखने का है। इन फैसलों को घाटी में पंडितों की वापसी और यहां के सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन में उनके योगदान से युवा पीढ़ी को अवगत कराने की कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए। ये फैसले प्रतीकात्मक हो सकते हैं, लेकिन इनके निहितार्थ गहरे हैं। नब्बे के दशक में अपने घरों से बेघर हुए कश्मीरी पंडितों के जख्म 30 वर्षों बाद भी हरे हैं। काबिले गौर है कि कश्मीर में पंडितों का इतिहास लगभग पांच हजार साल पुराना है। तेरहवीं सदी में जब इस्लाम कश्मीर का बहुसंख्यक धर्म बन गया, तब भी पंडित और मुस्लिम एक साथ सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहते थे। मुस्लिम ज्यादातर व्यापार करते, जबकि पंडित पढ़ने-लिखने वाली कौम थी। 1989 में पंडितों की हत्याएं और उनके घरों पर हमले शुरू हो गए। 1989-90 में लगभग ढाई लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया। ये विभाजन के बाद देश का सबसे बड़ा पलायन था। 2008 में मनमोहन सिंह सरकार ने घोषणा की थी कि पंडितों की घाटी में वापसी के लिए छह हजार युवाओं को सरकार नौकरी देगी और तीन हजार युवाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए मदद करेगी। लेकिन यूपीए सरकार में महज 1,400 नौकरियां मिल पाईं, जबकि मौजूदा सरकार में आज लगभग चार हजार नौकरियां मिल चुकी हैं और दो हजार प्रक्रियाधीन हैं। कश्मीरी विस्थापितों की पुश्तैनी संपत्तियों के संरक्षण के लिए जम्मू कश्मीर सरकार ने 1997 में जम्मू और कश्मीर प्रवासी अचल संपत्ति (संरक्षण और संकट बिक्री पर संयम) अधिनियम बनाया। लेकिन इसका ठीक से क्रियान्वयन नहीं हो पाया। इस कानून के मुताबिक, संबंधित जिलाधीश को प्रवासी संपत्तियों का संरक्षक बनाया गया, लेकिन लोगों ने इसे बड़ी चालाकी से दरकिनार करते हुए संपत्तियां या तो हथिया लीं या औने-पौने दामों पर खरीद लीं। क्रियान्वयन में खामियों को दूर करने के लिए हाल में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने विस्थापितों की ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने के लिए एक पोर्टल का लोकार्पण किया है। 












आलाकमान की भूमिका: भाजपा शासित राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन के मायने

अब यही सब भाजपा में भी दिखता है। फर्क यह है कि कांग्रेस अब तीन राज्यों में सिमट चुकी है और 17 राज्यों में भाजपा की अपने दम पर या सहयोगी दलों (एनडीए) के साथ सरकारें हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले कुछ महीनों में कई राज्यों के पदासीन मुख्यमंत्रियों को बदल दिया है। इससे स्पष्ट है कि भाजपा में भी राज्यों के मामले में केंद्रीय आलाकमान की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है, जैसा कि कांग्रेस में देखा जाता था। कांग्रेस में आलाकमान के इशारे पर मुख्यमंत्री राज्यों में अपनी हुकूमत चलाते थे। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के जमाने में यही होता था और सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। अब यही सब भाजपा में भी दिखता है। फर्क यह है कि कांग्रेस अब तीन राज्यों में सिमट चुकी है और 17 राज्यों में भाजपा की अपने दम पर या सहयोगी दलों (एनडीए) के साथ सरकारें हैं। सबसे पहले बात असम से शुरू करें, तो चुनाव जीतने के बाद वहां के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को हटाकर हेमंत विस्व सरमा को मुख्यमंत्री बनाया गया। जोड़-तोड़ करने और पूरे पूर्वोत्तर में विभिन्न दलों से भाजपा का गठबंधन करवाने में हेमंत विस्व सरमा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हालांकि चुनाव के दौरान सर्वानंद सोनोवाल के विकास कार्यक्रमों का हवाला दिया जाता रहा। सोनोवाल ने एक ऐसे माहौल में जीत दर्ज की, जब भाजपा कई राज्यों में चुनाव हार रही थी। गौरतलब है कि असम में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी थी, क्योंकि असम समझौते के कई पहलुओं को सीएए अनदेखा करता है। 'अहोमिया अस्मिता' सीएए के कई प्रावधानों से असहमत थी। इसके बावजूद सोनोवाल एक कठिन चुनाव जीतने में कामयाब रहे, लेकिन चुनाव जीतने के बाद राज्य की कमान हेमंत विस्व सरमा को सौंपी गई। सोनोवाल के विकासवाद की तुलना में हेमंत विस्व सरमा की प्रखर हिंदुत्व की छवि और पूर्वोत्तर में उनकी नेतृत्व क्षमता को देखते हुए यह निर्णय लिया गया। वहीं उत्तराखंड में कुछ ही महीनों में कई मुख्यमंत्री बदले गए। त्रिवेंद्र सिंह रावत पार्टी एवं संघ के कर्मठ व क्षमतावान नेता माने जाते थे, इसलिए साफ छवि वाले पुराने नेता खंडूरी को दरकिनार कर उन्हें राज्य की बागडोर सौंपी गई थी। लेकिन कहा जाता है कि कुंभ के आयोजन को लेकर मतभेद के कारण उन्हें हटाकर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया। पर कुंभ के आयोजन में भारी भीड़ इकट्ठी हुई और ऐसा माना जाता है कि कई लोग बिना कोरोना जांच आरटीपीसीआर कराए ही वहां पहुंच गए। कोविड की दूसरी विनाशकारी लहर के लिए कुंभ के आयोजन को भी जिम्मेदार माना गया है, लोगों में पार्टी की छवि खराब होने लगी, तो तीरथ सिंह रावत को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर वहां पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया। उत्तर प्रदेश में भी कयास लगाए जा रहे थे कि गुजरात कैडर के पूर्व नौकरशाह अरविंद शर्मा, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाते हैं, को लाकर सरकार में कोई ऊंचा पद दिया जाएगा। उस दौरान संघ के कई नेताओं ने भी उत्तर प्रदेश का दौरा किया था, लेकिन अंततः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने का फैसला किया गया। हाल ही में कर्नाटक में भी येदियुरप्पा को बाहर का रास्ता दिखाया गया। उनकी निकट सहयोगी शोभा करंदलाजे को पहले केंद्र के कैबिनेट में शपथ दिलाई गई, उसके बाद समाजवादी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया गया। येदियुरप्पा कद्दावर नेता हैं और कांग्रेस और कुमारस्वामी की पार्टी की गठबंधन सरकार को गिराकर राज्य में भाजपा को सत्ता दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि येदियुरप्पा की ज्यादा उम्र और भ्रष्टाचार का मुद्दा भी उनके खिलाफ था। इसलिए आने वाले चुनाव में भाजपा अपनी एक नई छवि और समाजवादी जनाधार को साथ जोड़कर आगे बढ़ना चाहती है। ऐसे में येदियुरप्पा को बाहर का रास्ता दिखाना पार्टी के लिए लाजिमी था। भाजपा आलाकमान ने कई महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान दिया। सबसे पहले तो यही कि महत्वपूर्ण लिंगायत वोट भाजपा से बिदक न जाए और दूसरी बात यह कि एक समाजवादी पृष्ठभूमि वाले नेता को आगे कर पार्टी की अंदरूनी प्रतिस्पर्धा पर अंकुश लगाया जाए। येदियुरप्पा को इस सरकार से दूर भी किया गया है और उनके बेटे को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है, ताकि सरकार स्वतंत्र और भ्रष्टाचार मुक्त होकर काम कर सके। अब अगर गुजरात की बात करें, तो नरेंद्र मोदी के केंद्र में आने के बाद आनंदी बेन पटेल को वहां का मुख्यमंत्री बनाया गया। फिर उन्हें हटाकर विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया। यह एक प्रयोग भी था कि पाटीदार समुदाय से अलग होकर रूपाणी को बागडोर सौंपी गई। लेकिन अब भाजपा आलाकमान ने भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया है। वह पाटीदार समुदाय से हैं और सरदारधाम विश्व पाटीदार केंद्र के ट्रस्टी भी हैं। कोविड काल में रूपाणी के नेतृत्व पर सवाल भी उठाए गए। इसके अलावा पिछले दिनों आम आदमी पार्टी की सभा में लोगों की भारी उपस्थिति ने भी भाजपा आलाकमान को चेता दिया। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन किया गया है। कुल मिलाकर देखें, तो भाजपा भी कांग्रेस की तरह राज्यों में अपने राजनीतिक आकलन के हिसाब से नेतृत्व परिवर्तन को अंजाम दे रही है। ऐसा लगता है कि भारतीय राजनीति में जो पार्टी केंद्रीय सत्ता में वर्चस्व में होती है, वह राज्यों में भी अपना दखल जारी रखती है और यह भारतीय राजनीति की संस्कृति बन गई है। लेकिन कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व परिवर्तन में अंतर है। कांग्रेस में जहां आलाकमान के प्रति वफादारी के आधार पर नेतृत्व परिवर्तन होते हैं, वहीं भाजपा में आगामी चुनाव की जरूरतों और जनरोष के मद्देनजर परिवर्तन किए जाते हैं, किसी पक्षपात या वफादारी के आधार पर नहीं। भाजपा के नेतृत्व परिवर्तन में राजनीतिक दक्षता महत्वपूर्ण है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व परिवर्तन में आलाकमान के प्रति निष्ठा को तवज्जो मिलती है। भाजपा में यदि कहीं आंतरिक प्रतिस्पर्धा होती भी है, तो उसकी खबर मीडिया में नहीं आती, जबकि कांग्रेस में अंतर्कलह की बातें खुलकर मीडिया में आ रही हैं। यानी भाजपा जहां अनुशासित पार्टी है, वहीं कांग्रेस में अनुशासन का अभाव दिखता है। इसकी एक वजह यह है कि कांग्रेस के राज्यस्तरीय नेता आलाकमान से मजबूत हैं। राज्यों के चुनाव में स्थानीय मुद्दे एवं स्थानीय नेतृत्व की भूमिका अहम रहती है। ऐसे में देखना यह है कि यह राजनीतिक दांव भाजपा के लिए फायदेमंद रहता है या नहीं।

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