शैलेन्द्र अग्रवाल
जयपुर। कहने को संविधान नागरिकों को देश में कहीं भी नौकरी प्राप्त करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन पंजाब, गुजरात व तमिलनाडू में नौकरी के लिए स्थानीय भाषा की परीक्षा पास करने का प्रावधान है।
तीनों राज्यों में सिविल सेवा में भर्ती के नियमों में इसका उल्लेख है, जबकि राजस्थान में पांच साल में करीब एक प्रतिशत पदों पर अन्य राज्यों के युवक—युवती चयनित हुए। विधानसभा में बजट सत्र में पूछे गए सवालों पर राज्य सरकार की ओर से यह जानकारी आई। राज्य सरकार का कहना है कि गुजरात, पंजाब तथा तमिलनाडू में नौकरी के लिए राज्य के मूल निवासी होने की बाध्यता नहीं है, लेकिन राजकीय सेवा में स्थानीय भाषा में टंकण परीक्षा या अन्य परीक्षा पास करने का प्रावधान है। इस मुद्दे पर विधायकों की चिंता का अंदाजा लगाने को यह काफी है कि अकेले बजट सत्र में चार विधायकों ने प्रश्न पूछकर यह मुद्दा उठाया।
आरपीएससी ने 427 का चयन किया
विधानसभा में आइ जानकारी के अनुसार पिछले पांच साल में राजस्थान लोक सेवा आयोग ने 43683 पदों के लिए भर्ती की, जिनमें से 427 पद यानि 0.97 प्रतिशत पदों पर प्रदेश के बाहर के अभ्यर्थियों का चयन हुआ। कर्मचारी चयन बोर्ड की ओर से की गई भर्तियों में यह प्रतिशत 1.10 प्रतिशत रहा।
यह भी जानकारी आई
प्रदेश में पंजीकृत बेरोजगार (31 दिसम्बर 2020 तक)—1481878
राजस्थानी भाषा बोलने वाले— देशभर में 25806344 व प्रदेश में 25279304
विधानसभा में यह बताया गया
विधायक बलजीत यादव का सवाल— क्या सरकार का प्रदेश के मूल निवासियों को ही नौकरियां देने का विचार है?
जवाब— गुजरात में गुजराती, पंजाब में पंजाबी और तमिलनाडू में तमिल भाषा में टंकण या अन्य परीक्षा पास करने का प्रावधान है, लेकिन मूल निवासी को ही नौकरी देने का कहीं प्रावधान नहीं है। विभिन्न राज्यों के विधिक प्रावधानों के अध्ययन के बाद ही कोई निर्णय संभव है।
शकुंतला रावत का सवाल— क्या सरकार का बाहरियों को रोकने का इरादा है?
जवाब — सेवा नियमों में भारतीय नागरिकों को सेवा में लेने का प्रावधान है, इसलिए बाहरियों की नियुक्तियां रोकने की मंशा नहीं है।
इन्होंने भी पूछे सवाल— पानाचंद मेघवाल व अमित चाचान।
'हर नागरिक को हर राज्य में नौकरी करने का समान अधिकार प्राप्त होना चाहिए।'— बी एल जाटावत, पूर्व अध्यक्ष, राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड
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