हुब्बल्ली/बेंगलूरु. चट्टान, गोचर व सरकारी जमीन की मिट्टी पर भी समाजकंटकों की नजर कुदृष्टि पड़ी है। अनाज उगाने वाली मिट्टी पर ईंट भट्टा मालिकों की बुरी नजर है। पहले ही रियल एस्टेट ने उपजाऊ जमीन को निगला है। विकास योजनाएं जैसे हवाई अड्डा, आठलेन सडक़, सरकारी कार्यालय, स्टेडियम निर्माण के लिए उपजाऊ जमीन का शिकार होती रही है। अब वर्ष में न्यूनतम दो बेहतर फसल उगाने वाले धारवाड़ जिले में स्थित अद्र्धमलेनाडु क्षेत्र के गांवों में उपजाऊ जमीन को दिन दहाड़े लूटा जा रहा है। खनन माफिया की तरह मिट्टी माफिया ने भी सिर उठाया है।
किसानों ने स्वयं किया अपराध
रासायनिक खेती से वर्ष दर वर्ष जमीन की उर्वरकता घट रही है। किसान अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए लाख कोशिश कर रहे हैं। इसी दौरान फसल उगाने वाली उपजाऊ मिट्टी को बिना किसी शोर-शराबे के ईंट भट्टा के लिए इस्तेमाल करने वाला भू माफिया सिर उठाया है। गरीब, कर्ज के बवंडर में फंसे किसान तथा मौजमस्ती करने वालों के खर्च के लिए पैसे देने वाले बिचौलिए किसानों के खेतों में स्थित उपजाऊ मिट्टी को खेतों से निकालकर ढेर लगा रहे हैं। फसल उगाने वाली जमीन में मौजूद तीन-चार फीट मिट्टी बहुत बेहतरीन है, इसी से बेहतर फसल संभव है परन्तु ईंट के लिए भू माफिया इसी मिट्टी को लूट रहे हैं।
बर्बाद हुई सरकारी गोचर जमीन
धारवाड़ जिले में अभी भी गांव ठाणा, सरकारी गोचर, तालाब तटों पर खराब जमीन, नहरों के छोर, तालाब परिसर समेत सभी जगहों पर उपजाऊ मिट्टी होती ही है। 27 हजार हेक्टेयर सरकारी पड़ा जमीन है। इसमें 700 हेक्टेयर जमीन अतिक्रमण का शिकार हुई है। इस जमीन में स्थित उपजाऊ मिट्टी को रातोंरात ईंट भट्टा तैयार करने वाले उद्यमी लूटकर लाखों मीट्रिक टन के हिसाब से संग्रह कर रहे हैं। वास्तव में यह जमीनें पर्यावरण संवेदनशील (इको जोन) क्षेत्र हैं। पेड़-पौधे, फूल-लता, मवेशियों के लिए घास, जल संचय के तौर पर भू जलस्तर वृध्दि में भी सहायक हैं परन्तु यहां की उपजाऊ मिट्टी को अत्यधिक पैमाने पर लूटा जा रहा है। वर्ष दर वर्ष गोचर जमीनें मिट्टी की खदानें बन रही हैं।
तालाब की मिट्टी चोरी
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी हिसाब में भी हस्तक्षेप करने वाले हिस्ट्रीशीटर अपने ईंट उद्योग चलाने के लिए कुछ अधिकारियों, ग्राम पंचायत के स्थानीय छुटभैए राजनेताओं की पलटन को पार्टी देकर तालाबों से गाद हटाने वाली उपजाऊ मिट्टी को ही ले जा रहे हैं। आमतौर पर किसान तालाब स्थित उपजाऊ मिट्टी को वापस जमीन पर डालकर अच्छी फसल उगाने के लिए तैयार करना प्रचलन में है। पारम्परिक खेती पद्धति में इस तालाब की मिट्टी को विशेष दर्जा है। खाद के बराबर भू पोषक तत्व इस मिट्टी में होते हैं परन्तु इससे ईंट जलाने का कार्य करना मात्र खेती के लिए मारक हो रहा है।
वन जमीन पर भी अतिक्रमण
मिट्टी लूटने वालों के लिए वन भूमि भी कम नहीं पड़ रही है। राजनीतिक ताकत का इस्तमाल कर नौकरशाही पर रसूख डालकर वन भूमि पर स्थित उपजाऊ मिट्टी तथा अच्छी गुणवत्ता के पत्थरों को भी भू माफिया लूट रहे हैं।
मिट्टी की रक्षा के लिए कानून बनाए सरकार
विशेषज्ञों का कहना है कि रेत माफिया, खनन माफिया, पत्थन खनन माफिया, टिंबर माफिया का दौर खत्म हो गया है, अब मिट्टी माफिया धीरे-धीरे सिर उठा रहा है। धारवाड़ जिले में ईंट भट्टा उद्योग की ताकत बढ़ी है। ईंट बिक्री वर्ष दर वर्ष दसियों गुना बढ़ रही है। उपजाऊ मिट्टी, पुराने इमली के पेड़ पल भर में गायब हो रहे हैं। सरकार को तुरन्त इस माफिया पर लगाम कसकर, उपजाऊ जमीन की रक्षा के लिए जरूरी कानून बनाने की जरूरत है।
अभी से संग्रह
एक डम्पर मिट्टी के लिए 550 रुपए के हिसाब से मिट्टी खरीदकर संग्रह करते हैं। हो सकता है आगामी वर्ष मिट्टी ना मिले या फिर सरकार कठोर कानून बना दे। इसलिए अभी से संग्रह किया जा रहा है। प्रदीप लेगोडे, ईंट व्यापारी, कलघटगी
फिलहाल यह अनिवार्य
किसान खेत की मिट्टी को मकान, खरीदारी, दैनिक खर्च के लिए बेच रहे हैं। मिट्टी बिक्री से खेत बर्बाद हो रहे हैं परन्तु फिलहाल यह अनिवार्य है।
लक्ष्मण तलवार, किसान, मुगद-मंडिहाल
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