दअनिल जैन के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के तीन साल पूरे करने जा रहे नरेन्द्र मोदी के इस पद पर आठ साल पूरे हो जाएंगे। मई‚ २०१४ में प्रधानमंत्री बनने से पहले वे करीब साढ़े बारह साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे थे। उस भूमिका में रहते हुए उन्होंने अपनी छवि विकास पुरु ष की बनाई थी। इसी छवि के सहारे वे प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हुए थे। प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में उन्होंने देश की जनता से ६० महीने मांगते हुए कई वादे किए थे। ॥ देश की जनता ने उनके वादों पर एतबार करते हुए उन्हें न सिर्फ पांच साल का एक कार्यकाल सौंपा‚ बल्कि उस कार्यकाल में तमाम मोर्चों पर उनकी नाकामी के बावजूद उन्हें पूर्ण बहुमत के साथ पांच साल का दूसरा कार्यकाल भी दे दिया। यही नहीं‚ इस दौरान कई राज्यों में भी भाजपा की सरकारें बन गइÈ–कहीं स्पष्ट जनादेश से तो कहीं विपक्षी विधायकों की खरीद–फरोख्त के जरिए जनादेश का अपहरण करके। लेकिन दुनिया ने देखा है कि सत्ता में आने कुछ समय बाद ही प्रधानमंत्री मोदी की प्राथमिकताएं बदल गइÈ। आठ वषाç के दौरान उनकी सरकार और पार्टी का एक ही मूल मंत्र हो गया–‘विकास का झंडा और नफरत का एजेंडा।' इसी मंत्र के साथ काम करते हुए मोदी सरकार अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर तो बुरी तरह नाकाम साबित हो ही रही है‚ देश के अंदरूनी यानी सामाजिक हालात भी बेहद असामान्य बने हुए हैं। पिछले सात–आठ वषाç के दौरान देश के भीतर बना जातीय और सांप्रदायिक तनाव–टकराव का समूचा परिoश्य गृहयुद्ध जैसे हालात का आभास दे रहा है‚ जिसके लिए पूरी तरह उनकी सरकार और पार्टी की विभाजनकारी राजनीति जिम्मेदार है। ॥ आर्थिक तस्वीर बदलने का इरादा॥ आठ साल पहले नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के ढाई महीने बाद जब १५ अगस्त २०१४ को स्वाधीनता दिवस पर लालकिले से पहली बार देश को संबोधित किया था तो उनके भाषण को समूचे देश ने ही नहीं‚ बल्कि दुनिया के दूसरे तमाम देशों ने भी बड़े गौर से सुना था। विकास और हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद की मिश्रित लहर पर सवार होकर सत्ता में आए मोदी ने अपने उस भाषण में देश की आÌथक और सामाजिक तस्वीर बदलने का इरादा जताते हुए देशवासियों और खासकर अपनी पार्टी तथा उसके सहमना संगठनों के कार्यकर्ताओं से अपील की थी कि अगले दस साल तक देश में सांप्रदायिक या जातीय तनाव के हालात पैदा न होने दें॥। प्रधानमंत्री मोदी के इस भाषण के बाद उम्मीद लगाई जा रही थी कि उनकी पार्टी तथा उसके सहमना संगठनों के लोग अपने और देश के सर्वोच्च नेता की ओर से हुए आह्वान का सम्मान करते हुए अपनी वाणी और व्यवहार में संयम बरतेंगे। लेकिन रत्ती भर भी ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रधानमंत्री की नसीहत को उनकी पार्टी के निचले स्तर के कार्यकर्ता तो दूर‚ केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्रियों‚ सांसदों‚ विधायकों और पार्टी के प्रवक्ताओं–जिम्मेदार पदाधिकारियों ने भी तवज्जो नहीं दी। इन सबके मुंह से सामाजिक और सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने वाले नये–नये बयानों के आने का सिलसिला न सिर्फ जारी रहा‚ बल्कि वह नये–नये रूपों में और तेज हो गया॥। इसे संयोग कहें या सुनियोजित साजिश कि प्रधानमंत्री के इसी भाषण के बाद देश में चारों तरफ से सांप्रदायिक और जातीय हिंसा की खबरें आने लगीं। कहीं गोरक्षा और धमाÈतरण के नाम पर‚ तो कहीं मंदिर–मस्जिद और आरक्षण के नाम पर और कहीं वंदे मातरम‚ भारत माता की जय और जय श्रीराम के नारे लगवाने को लेकर। इसी सिलसिले में कई जगह महात्मा गांधी और बाबा साहेब अंबेडकर की मूÌतयों को भी विकृत और अपमानित करने तथा कुछ जगहों पर नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाने जैसी घटनाएं भी हुइÈ। हैरानी और अफसोस की बात तो यह है कि इन सारी घटनाओं का सिलसिला कोरोना जैसी भीषण महामारी के दौर में भी नहीं थमा और आज तो चरम पर है॥। मोदी सरकार की आÌथक नीतियों और कार्यक्रमों से देश की अर्थव्यवस्था का जो हाल हुआ है‚ उसकी तस्वीर बेहद डरावनी है। नोटबंदी और जीएसटी–ये मोदी सरकार के दो ऐसे विनाशकारी फैसले रहे हैं‚ जिनकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है‚ और जिनकी मार से किसान‚ मजदूर‚ कर्मचारी‚ छोटे और मझौले कारोबारी समेत समाज का तबका आज भी बुरी तरह कराह रहा है॥। भारत सरकार भले ही दावा करे कि आÌथक तरक्की के मामले में पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है‚ लेकिन हकीकत यह है कि वैश्विक आÌथक मामलों के तमाम अध्ययन संस्थान भारत की आÌथक स्थिति का शोकगीत गा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनडीपी ने तमाम आंकड़ों के आधार पर बताया है कि भारत टिकाऊ विकास के मामले में दुनिया के १९० देशों में ११७वें स्थान पर है। अमेरिका और जर्मनी की एजेंसियों ने जानकारी दी है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के ११६ देशों में भारत १०१वें स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र के प्रसन्नता सूचकांक में भारत की स्थिति में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है। ‘वर्ल्ड़ हैपिनेस रिपोर्ट' यानी ‘वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक–२०२२' में भारत को इस बार १३६वां स्थान मिला है। १४६ देशों में भारत का मुकाम दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देशों से ही नहीं‚ बल्कि पाकिस्तान समेत सभी छोटे–छोटे पड़ोसी देशों और युद्धग्रस्त फिलिस्तीन से भी पीछे है। ॥ बेरोजगारी चरम पर॥ देश में बेरोजगारी की भयावह स्थिति चरम पर है। सेंटर फॉर मोनिटिरंग ऑफ इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक मार्च‚ २०२२ में भारत का रोजगार बाजार और सिकुड़ गया। इस महीने रोजगार की तलाश से निराश होकर १४ लाख लोगों ने अपने को इस बाजार से अलग कर लिया। इस तरह भारत के श्रम बाजार में मौजूद लोगों की संख्या ३९ करोड़ ६० लाख रह गई है। सीएमआईई ने अपनी रिपोर्ट में कहा गया है–‘ये आंकड़े़ भारत में आÌथक विपदा का सबसे बड़ा संकेत हैं। लाखों लोगों ने रोजगार बाजार छोड़ दिया है। संभवतः इसका कारण यह है कि वे नौकरी पाने में नाकामी से बेहद हताश हो गए हैं।' ॥ सीएमआईई ने बताया है कि बीते फरवरी में भारत में श्रम भागीदारी दर ३९.९ फीसद थी‚ जो मार्च में ३९.६ प्रतिशत रह गई। किसी भी खुशहाल देश में यह दर ६० से ७० फीसद के बीच होती है यानी कामकाज में सक्षम आबादी के बीच कुल इतने लोग रोजगार बाजार में मौजूद रहते हैं। भारत की कहानी उलटी दिशा में है। इस तरह की रिपोर्टों के बीच पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और देश को आत्मनिर्भर बनाने के प्रधानमंत्री के दावे कितने हवाई हैं‚ आसानी से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले जारी हुई पेंशन सिस्टम की वैश्विक रेटिंग में भी दुनिया के ४३ देशों में भारत का पेंशन सिस्टम ४०वें स्थान पर आया है। उम्रदराज होती आबादी के लिए पेंशन सिस्टम सबसे जरूरी होता है ताकि उसकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। भारत इस पैमाने पर सबसे नीचे के चार देशों में शामिल है। पासपोर्ट रैंकिंग में भी भारत ८४वें स्थान से फिसल कर ९०वें स्थान पर पहुंच गया है। यह स्थिति भी देश की अर्थव्यवस्था के पूरी तरह खोखली हो जाने की गवाही देती है। ॥ सरकार का कहना है कि कोरोना महामारी ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है लेकिन सच यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था के ढहने का सिलसिला कोरोना महामारी के पहले नोटबंदी के साथ ही शुरू हो गया था‚ जिसे कोरोना महामारी और याराना पूंजीवाद पर आधारित सरकार की आÌथक नीतियों ने तेज किया है‚ और जिसके चलते देश आÌथक रूप से खोखला हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुûपये की गिरावट के नित–नये कीÌतमान बन रहे हैं। वैश्विक स्तर पर भारत की साख सिर्फ आÌथक मामलों में ही नहीं गिर रही है‚ बल्कि लोकतंत्र‚ अभिव्यक्ति की आजादी‚ मानवाधिकार और मीडिया की आजादी में भी भारत की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग लगातार नीचे आ रही है। कुल मिला कर इस समय देश का जो परिoश्य बना हुआ है‚ वह आने वाले समय में हालात और ज्यादा संगीन होने के संकेत दे रहा है। ॥ द॥ वरिष्ठ पत्रकार॥
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