जयपुर . राजस्थान की धरा पर जब भी संगीत का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें एक नाम अनिवार्य रूप से स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा – स्वर कोकिल सीमा मिश्रा।
उनकी आवाज़ केवल गीतों में नहीं गूंजती, बल्कि वह रेगिस्तान की हवाओं, ढोल-ढाक और चंग की थाप, और लोक की सामूहिक स्मृतियों में बसती है।
वह एक गायिका मात्र नहीं हैं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक धड़कन हैं।
राजस्थान का संगीत परंपराओं से भरा हुआ है – मांड, पध, जिकड़ी, गोरबंद, बन्ना–बन्नी, तीज-त्यौहार के गीत, वीर-गाथाएं और लोरियां। लेकिन आधुनिकता और शहरीकरण की चकाचौंध में यह लोकसंगीत धीरे-धीरे पीछे छूट रहा था।
यही वह समय था जब सीमा मिश्रा ने अपनी साधना, अपने सुर और अपनी जीवनशक्ति से इस परंपरा को पुनर्जन्म दिया।
उनकी गायकी सुनते ही यह एहसास होता है कि राजस्थान का लोक बीता हुआ अतीत नहीं है, बल्कि सांस लेता हुआ वर्तमान है।
सीमा मिश्रा के सुरों में एक अद्भुत सम्मोहन है।
उनकी गायकी में मांड की गहराई, पध का उल्लास, और लोरी की करुणा सब एक साथ मिलते हैं।
उनकी आवाज़ में जब केसरिया बालम गूंजता है तो लगता है जैसे थार की रेत पर चांदनी उतर आई हो।
जब वह गोरबंद गाती हैं, तो मानो पूरा राजस्थान एक ही धुन में झूम उठता है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सीमा मिश्रा के बिना आज का राजस्थानी संगीत अधूरा होता।
उनसे पहले लोकसंगीत अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा था, और उनके बाद वह जीवित और प्रासंगिक बना रहा।
इतिहास गवाह रहेगा कि राजस्थानी लोकसंगीत सीमा मिश्रा से पहले और सीमा मिश्रा के बाद – दो हिस्सों में विभाजित है।
जब व्यावसायिक संगीत और फिल्मी गाने हर जगह छा रहे थे, सीमा मिश्रा ने यह साबित किया कि
“लोक कभी पुराना नहीं होता, लोक ही वह मिट्टी है जिससे हर नई कोंपल जन्म लेती है।”
उन्होंने अपनी गायकी से राजस्थान की भाषा, लोकधुनों और परंपराओं को उस समय बचाए रखा, जब यह खतरे में थे।
उनकी वजह से राजस्थान की पहचान – उसका संगीत – अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचा।
लोकसंगीत गाना केवल कला नहीं, बल्कि तपस्या है।
भारत की लोक संगीत सम्राज्ञी सीमा मिश्रा ने यह तपस्या वर्षों तक की है –
गांव-ढाणियों से लेकर शहर के मंचों तक,
लोक कलाकारों के साथ बैठकर सीखने से लेकर बड़े आयोजनों में मंच साझा करने तक।
उनकी यात्रा यह बताती है कि संगीत केवल शौक नहीं, बल्कि जीवन की साधना है, स्वर कोकिल सीमा मिश्रा अब केवल एक कलाकार का नाम नहीं, बल्कि एक युग हैं।
उनकी गायकी में पीढ़ियों की विरासत और आने वाले कल का भविष्य दोनों गूंजते हैं।
जब-जब कोई बच्चा केसरिया बालम गुनगुनाएगा,
जब-जब किसी तीज पर बन्ना-बन्नी गाई जाएगी,
जब-जब किसी मां की लोरी में थार की महक होगी—
तब-तब सीमा मिश्रा की आवाज़ उसमें जीवित रहेगी।
किसी भी संस्कृति को जिंदा रखने के लिए कुछ आवाजें नियति द्वारा चुन ली जाती हैं। राजस्थान के लिए वह आवाज़ है – सीमा मिश्रा।
उनका योगदान इतना विराट है कि यही कहना पर्याप्त है –
“मरु कोकिला सीमा मिश्रा ने न केवल गाया, बल्कि राजस्थानी संगीत को जिया, और उसी के साथ जीती-जागती संस्कृति को आने वाले समय तक सुरक्षित कर दिया।”
आर. जे. हिमांशु किरण शर्मा
बॉक्स एफ एम
जयपुर, राजस्थान
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