सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर की जयन्ती पर विशेष
✍🏻 डाॅ. नीतू कुमारी नूतन
राष्ट्रपति अवार्डी
लोकगीत एवं उपशास्त्रीय संगीत गायिका
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सुर साम्राज्ञी, स्वर कोकिला, अद्भुत, अद्वितीय, भारत की शान, मल्लिका-ए-तरन्नुम, सरस्वती की साक्षात अवतार, सुरो के माध्यम से अपनी स्वर-लहरियो का जादू समस्त कायनात में बिखेरने वाली भारत रत्न लता मंगेशकर!
लता ! एक बेनजीर गायिका । भारतीय स्वर-संधान की अकेली ऐसी शिखर, जहाँ श्रेणियों के अनेक उतार-चढ़ाव के साक्षात दर्शन होते हैं। नाद-ब्रह्म की सच्ची उपासिका लता को सुन - गुण कर ऐसा अहसास होता है कि स्वयं सरस्वती ने लता का रूपाकार ग्रहण कर लिया हो। जिह्वा पर सरस्वती के अनवरत नर्तन का ऐसा बोध होता है, जैसे हिमालय के सैकड़ों शिखर अपनी उज्ज्वलता से आह्लादित करने को आतुर हैं। हजारों गायक- गायिकाओं की भीड़ से बिल्कुल अलग लता मंगेशकर की गायिकी की ऊँचाई एवरेस्ट की मानिंद सर्वोच्च है।
लताजी के गायन में कलात्मक भावबोध के साथ संवेदना की अटल गहराई- दर्द- तन्हाई- टीस, कसक, हूक, गमक, मीड़ इत्यादि तत्त्वों की भरमार श्रोताओं को मदहोशी के आलम तक ले जाती है। गायन में पवित्रता का बोध, प्रेम की आकुल- व्याकुल पुकार, कोयल की मादक तान, चंचरीक की पंचम ध्वनि, पपीहे की पी- कहाँ, भौरों का मंद्र गुंजन - झरनों का संगीत, नदियों की गम - गम करती ध्वनि, सब कुछ एकाकार ध्वनित होते हैं। उनके अद्भुत गायन में शील,संस्कार, संयम, भक्ति, मर्यादा, शक्ति, मिलन- विरह और प्रकृति का शाश्वत अविराम संगीत परिलक्षित होता है। मानो, लता प्रकृति- संगीत की हू- ब- हू अनुवाद हैं। उन्होंने अपने सुंदर गान - कौशल से समस्त कायनात को आह्लादित किया है, उन्हें जीवन रस से सराबोर किया है, श्रोताओं की भावनाओं को सार्थक अभिव्यक्ति प्रदान की है। अभिव्यक्ति की बेशकीमती भरमार ऐसी कि सुनने वालो पर वज्द तारी हो जाता है। लता के गायन का विस्तार आक्षितिज है, जहाँ देखने वालो को धरती और आसमान एकाकार दिखाई पड़ते हैं। प्रकृति का समस्त सुर लता के गले के भीतर है। सुर की सिद्धि की अनूठी अभिव्यक्ति के रूप में लता रहती दुनिया तक याद की जाती रहेंगी, इसमें लेशमात्र संशय नहीं है। इसे प्रकृति का नियम कहें या कुदरत का करिश्मा कि उसने भारतवर्ष को लता जैसा अनुपम उपहार दिया, जिनके सच्चे सुरों की आलोक-आभा से आज समस्त संसार जगमग हो रहा है। स्वर की दृष्टि से तीनों सप्तकों में सुर की मर्यादा को बचाए रखने की दृष्टि से भी लता का कोई सानी नहीं है।
गायन की कोई ऐसी विधा नही, कोई धारा नहीं, जहाँ लता मंगेशकर की स्वर - लहरियों ने तरंगित न किया हो।
लता ने विविध उम्र की नायिकाओं के लिए पार्श्व गायन किया-- कम उम्र की बच्चियों के लिए, किशोरियों के लिए , युवतियों के लिए और प्रौढ़ा नायिकाओं के लिए पार्श्व गायन करते हुए स्वर के माध्यम से बिल्कुल सटीक और माकूल गायन की प्रस्तुतियों द्वारा हर उम्र-वर्ग को स्वरात्मक अभिव्यक्तियाँ प्रदान करने में कोई कोर - कसर नहीं छोड़ी है। ऐसी स्वरात्मक अभिव्यक्तियाँ अन्यत्र दुर्लभ हैं।
लता मंगेशकर ने अपने साक्षात्कार में कई बार इस बात के लिए अफसोस जाहिर किया कि समयाभाव की वजह से उन्होंने शास्त्रीय संगीत की साधना कम की , रियाज कम किए। मगर, भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान गायक उस्ताद फैयाज खां ने लता को सुन कर कहा था, "कमबख्त कभी बेसुरी ही नहीं होती।" लता को सुन कर ऐसा प्रतीत होता है कि सुर की मूल प्रकृति को बचाए रखने के लिए उन्होंने मानसिक रियाज का ज्यादा सहारा लिया है। गले की घिसाई कम की है, यही वजह है कि नारी कंठ का मूल प्राकृतिक स्वर उनके गले से ऐसा उतरता है, जैसे कि वंशी के छिद्रों से स्वर ! संगीत के विद्वानों का मानना है कि स्वर के मर्म, स्वर की मिठास और उसकी नैसर्गिक प्रकृति अतिशय रियाज करने से खत्म हो जाती है, प्राकृतिक स्वर का मुलम्मा उतर जाता है, जिसे लता ने बड़ी हिफाजत से जीवनपर्यंत बचाए रखा।
लता मंगेशकर को सुनकर अमेरिका के वैज्ञानिकों ने नतमस्तक होकर कहा कि "ऐसी सुरीली आवाज न आज तक कभी थी और ना ही कभी हो सकती है।" लता मंगेशकर कला-जगत की ऐसी महिला कला-शख्सियत हैं, जिनके नाम पर जीवित रहते हुए कला के दिग्गजो को पुरस्कार दिए जाते हैं।
लता मंगेशकर ने अपने जीवन में बीस से ज्यादा भाषाओं में 30000 ( तीस हजार ) से ज्यादा गाने गाए। अपने कैरियर में सबसे ज्यादा गाने रिकार्ड करने का अद्भुत गौरव भी लता मंगेशकर को प्राप्त है। लता ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा की बदौलत श्रोताओं को सुर के सभी रस- व्यंजन का पान कराया है। अनगिनत सोलो गाने गाये, वहीं युगल गीतों (डुएट) की ऐतिहासिक प्रस्तुतियाँ दे कई गीतों को उन्होंने अमरत्व प्रदान किए। चाहे महान शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी हों, मुकेश व मोहम्मद रफी हों, किशोर कुमार हों अथवा नये गायक। नये गायकों एवं बड़े गायकों के साथ भी उन्होंने अपने विशाल सांगीतिक चिंतन का परिचय दिया। लता ने कवि प्रदीप द्वारा लिखित देशभक्ति से ओत-प्रोत "ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी..." की ऐसी अद्वितीय प्रस्तुति की, जिसे सुनकर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू रो पड़े थे। प्रदीप की यह अमर कृति गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर लता की मखमली आवाज में देशभक्ति का जज्बा पैदा करती है, वातावरण को गुंजायमान बना देती है। लता के खूबसूरत स्वरों से सुसज्जित यह गीत रहती दुनिया तक लोगों को रुलाता रहेगा, सदियों तक लता अपने स्वर-लहरियों के माध्यम से मानव-मन को आह्लादित करती रहेंगी, दुनिया लता मंगेशकर की मौजदूगी का निरंतर अहसास करती रहेगी।
महज पाँच वर्ष की उम्र में लता ने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर से संगीत की विधिवत शिक्षा लेनी प्रारंभ की, बाद में उस्ताद अमन अली खान से उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान तथा अन्य महान कला साधकों के सामीप्य ने लता को निरंतर तराशा।
पिता दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद लता ने सन 1942 में महज 13 वर्ष की उम्र में मराठी फिल्म 'किती हसाल' के लिए पहला गाना गाया। गायन के साथ लता ने कुछ हिन्दी एवं मराठी फिल्मों में अभिनय भी किये, जिनमें मंगला गौर, माझे बाल, गजभाऊ, जीवन यात्रा आदि प्रमुख हैं। शुरू में लता की गायिकी पर नूरजहाँ और शमशाद बेगम का असर था, मगर बाद में लता ने अपनी खुद की शैली विकसित की।
करीब 70 साल के अपने कैरियर में उन्होंने इंडस्ट्री की तकरीबन सभी महान नायिकाओं के लिए गाने गाए। लता की खूबसूरत आवाज से सुसज्जित फिल्म बरसात, अनारकली, मुगल- ए- आजम, पाकीजा, संघर्ष, प्रेमनगर, अमर प्रेम, गाइड, लैला मजनूं, प्रेमरोग, सिलसिला, लेकिन, आशा, एक दूजे के लिए , सत्यम् शिवम् सुंदरम्, राम लखन, हिना, नगीना आदि फिल्मों के गीत अमर कृति बन गये। फिल्म महल के "आएगा आने वाला.." गीत से लता को नई पहचान मिली, लता सिर्फ और सिर्फ गाती चली गई और समय के साथ लता की आवाज में दिन-प्रतिदिन निखार आता चला गया।
लता को लेकर बेहद आश्चर्य की बात यह है कि अपने संपूर्ण करियर में उन्होंने चार-चार पीढ़ियों की नारियों को जिया। वक्त का पहिया अपने हिसाब से घूमता रहा, प्रेम, समर्पण और मानवीय संवेदनाओं के अर्थ समय के साथ बदलते गये। मगर, इन बदलावों से बेखबर लता ने हर पीढ़ी को उसी वातावरण के अनुरूप जिया। लता ने नई पीढ़ी की कमसिन युवती के निश्छल भाव, फिर यौवन की ओर बढ़ते उसके जज्बात, उसकी भावनाएँ , युवती की संपूर्ण नारी के रूप में परिणति- उसकी आकांक्षाएँ, फिर उस नारी का प्रौढ़ स्वरूप यानी एक पीढ़ी की औरत के समस्त जीवन को स्वर के माध्यम से उन्होंने उकेर कर रख दिया हो। समय बदला, फिर उसी प्रकार नई कमसिन युवती ने जन्म लिया, जिसने क्रमश: नवयौवना, संपूर्ण स्त्री के बाद प्रौढ़ा का स्वरूप ग्रहण किया। लता ने उस औरत के हर उम्र को अपनी आवाज दी। फिर, उसका भी जीवन वक्त के साथ ढलता चला गया।
और नवयौवना एकबार फिर जन्म लेती है, उसके जीवन का चक्र भी क्रमवार पूरा होता है....और यह सिलसिला लागातार यूँ ही चार पीढ़ियों तक अनवरत चलता चला जाता है। अकेली लता मंगेशकर ने चार पीढ़ियों के स्त्री-जीवन के सभी रंगों को जिया। खुद में असंभव, आश्चर्यजनक, हैरतअंगेज और किसी चमत्कार से यह कतई कम नहीं है। यह कैसे संभव हो पाया ? लता इन गुणों को प्रारब्ध में लेकर अवतरित तो हुईं ही थीं, मगर लता की इन खूबियों को उनके संगीत निर्देशकों ने तराशा। वे निर्देशक अलग-अलग पीढ़ी, परिवेश एवं पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले थे। उन निर्देशकों की परिकल्पनाएँ और अलग-अलग शैलियाँ लता के सांगीतिक चिंतन को परिपक्व करती चली गयीं। लता ने वसंत देसाई, एस. डी.बर्मन, गुलाम मोहम्मद, भूपेन हजारिका, सलिल चौधरी, नौशाद, सी. रामचंद्रन, मदनमोहन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, शंकर-जयकिशन, अनिल विश्वास, शिव-हरि, खैयाम, राम-लक्ष्मण आर.डी.बर्मन,अनु मल्लिक, ए.आर. रहमान आदि नामचीन संगीत निर्देशकों के साथ काम किया। मगर संगीतकार गुलाम हैदर ने लता की प्रतिभा की सही पहचान की, वे लता के मेंटर रहे। एक साक्षात्कार में लता ने गुलाम हैदर को अपना असली गुरु बताया था।
फिल्म मुगल-ए-आजम में '"प्यार किया तो डरना क्या..." में प्रेम में समर्पित बगावती प्रेमिका के स्वर, संघर्ष में वैजयंतीमाला-दिलीप कुमार के लिए "मेरे पास आओ नजर तो मिलाओ.." में कमसिन मगर परिपक्व नायिका का प्रेमी को भरोसा-विश्वास दिलाना, गाईड में "मोहसे छल किए जाए..." में प्रेम का परित्याग अथवा प्रेम से संन्यास लेती प्रेमिका, "कांटो से खींच के ये आंचल..." में अभी- अभी घर की दहलीज से निकली प्रेमिका की उन्मुक्तता की झलक , फिल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' में जीनत अमान के लिए "हाय- हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी..." में बरसात के मौसम में प्रणयातुर प्रेयसी की वेदना को लता ने अपने स्वर के माध्यम से सुसज्जित किया, प्रेमनगर में ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी के लिए "ये कैसा सुरमंदिर है, जिसमें संगीत नहीं..." में प्रेम को आस्था- कर्तव्यबोध से जोड़ती नायिका, पाकीजा में "इन्ही लोगों ने ले लिन्हा दुपट्टा मेरा..." में आम वेश्या के भाव तो "यूँ ही कोई मिल गया था.." व "ठारे रहिओ ओ बांके यार" में कोठे की उच्च कोटि की नर्तकी के किरदार को साकार किया। फिल्म 'दोस्ताना' में "कितना आसाँ है कहना भूल जाओ..." में अनुशासित, संवेदनशील और समर्पित प्रेमिका को उन्होंने जीवंत किया, फिल्म 'गंगा जमुना सरस्वती' में अभिनेत्री और शास्त्रीय नर्तकी मीनाक्षी शेषाद्रि के लिए क्लाईमेक्स सांग "गंगा आजा आजा..." में खास कर अंतरे में नृत्य के समस्त भावों को अपने स्वर के माध्यम से उन्होंने साकार कर दिया। गजलों की बात करें तो "हमको मताए इश्क में बाजार की तरह..." में लता ने गजल गायकी को पूरे अनुशासन और उत्कृष्टता के साथ पेश किया, "कामदेव सी तोहरी सुरतिया ..." में स्वर-अभिव्यंजना की भावपूर्ण प्रस्तुति से 'रति' की कामनाओं को, मनुहार को अपनी अभिव्यिक्त से साकार किया। स्वर को सीधी रेखा के समान खड़ा कर उसमें मिठास की चासनी भरना लता की खास खूबी रही है। लता के इन सांगीतिक करिश्मा को शब्दो में समेट पाना कतई संभव नहीं है।
लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर, 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर में गोमंतक मराठा परिवार में हुआ। पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय गायक व बेहतरीन थिएटर एक्टर थे। माता शेवंती ( शुधामती ) दीनानाथ की दूसरी पत्नी थीं। लता के बचपन का नाम हेमा था, जिसे बदलकर लता रख दिया गया। उनका सरनेम पहले हर्डीकर था, उनके पैतृक गाँव मंगेशी से सरनेम बदलकर मंगेशकर हो गया। माता-पिता की पहली संतान लता की तीन बहनें- मीना, आशा व उषा हुईं, जबकि भाई ह्रदयनाथ मंगेशकर हैं, जो बेहतरीन संगीत निर्देशक हैं। पाँच साल की छोटी उम्र में लता ने पिता के म्यूजिकल नाटक में बतौर एक्ट्रेस काम किया। पिता को अपनी पुत्री में छिपी अद्भुत व विलक्षण प्रतिभा का पहले ही भान हो चुका था। पतली आवाज की वजह से कई संगीतकारों ने शुरू में उन्हें काम देने से मना कर दिया, लेकिन लता ने हार नहीं मानी। लगन व कठिन परिश्रम की बदौलत उन्हें काम मिलने लगे, अद्भुत प्रतिभा की वजह से उन्हें कामयाबी मिलती गई और देखते-देखते लता मंगेशकर भारत की सबसे लोकप्रिय गायिका बन गईं। यद्यपि लता ने रेकार्ड स्तर पर फिल्मी गीत गाए, मगर उनके गैर फिल्मी गीत भी कम लोकप्रिय नहीं हुए। यह सबको मालूम है कि लता ने शादी नहीं की। शादी नहीं करने के पीछे मुख्य कारण यह था कि पिता के निधन के बाद कम उम्र में परिवार की जिम्मेवारी उनके कंधे पर आ गई, जिस वजह से वे आजीवन कुँआरी रह गई। वही कुछ विद्वान इसे संगीत में ब्रह्मचर्य की अनिवार्यता से जोड़कर देखते हैं। कम लोग जानते हैं कि संगीत की यह महादेवी नंगे पैर गाने गाया करती थी।
लता का स्कूल से जुड़ा वाकया भी बड़ा दिलचस्प है। स्कूल में पहले दिन ही उन्होंने बच्चों को गाना सिखाना शुरू कर दिया। स्कूल के प्रबंधको को यह ठीक नहीं लगा। लता अपनी छोटी बहन आशा के साथ स्कूल जाती थीं, स्कूल प्रशासन ने आशा को साथ लाने से मना किया, जो लता को नागवार लगी और तब, लता ने स्कूल जाना हीं छोड़ दिया।
80 के दशक में लता मंगेशकर ने फिल्मी गाने कम कर दिए और उन्होंने स्टेज शो पर ध्यान केन्द्रित किया। लता मंगेशकर का 'लाईव शो' को अरेंज करना इतना आसान काम नहीं होता था। मंच पर उनके 300 म्यूजिशियन होते थे, उनके तकनीशियन सप्ताह भर पहले सारी कमान अपने हाथों में ले लेते थे। लता का स्पष्ट फरमान होता था कि जहाँ उनका लाईव शो होना होता है, उसके एक किलोमीटर की परिधि में एक महीना पहले से किसी प्रकार का ध्वनि यंत्र (लाउडस्पीकर) नहीं बजाया जाएगा। लता ने आनंद गान बैनर तले फिल्मों का निर्माण भी किया तथा संगीत निर्देशन भी किए।
पुरस्कार व सम्मान की बात करें तो वर्ष 2001 में उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न, 1974 में सबसे ज्यादा गीत गाने के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में विशेष सम्मान, 1989 में प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार,1969 में पद्म भूषण, 1999 में पद्म विभूषण, राष्ट्रीय पुरस्कार -1972, 1975 एवं 1990, फिल्म फेयर पुरस्कार- 1958, 1962, 1965, 1969,1993 तथा 1994 , फिल्म फेयर लाईफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड 1993, स्क्रीन का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 1996, राजीव गांधी पुरस्कार 1997, जी सिने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 1999, आई. सिने. ए. एफ.लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 2000, स्टारडस्ट लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 2001, महाराष्ट्र सरकार पुरस्कार- 1966 एवं 1967, महाराष्ट्र भूषण 2001 तथा नूरजहाँ पुरस्कार से वर्ष 2001 में नवाजा गया।
लता मंगेशकर आज संगीत- कला के जिस मुकाम और बुलंदियों पर विराजमान हैं, वहाँ से उनके विषय में कहा जा सकता है कि
"जहाँ मैं हूँ फरिश्तों से
वहाँ आया नहीं जाता।"
लता मंगेशकर के विषय में हम कह सकते हैं -
"आप इस कायनात मे अपनी मिसाल खुद ही हो।"
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