ज़िंदगी की घनी धूप में,बरगद सा वो खड़ा है |
असंख्य संकटों से मेरे,सशक्त ढाल बन लड़ा है |
कहता नहीं है मुझे कुछ,न प्यार ही जताता है |
पर उसकी आँखों में मुझे,संसार नज़र आता है |
यूँ तो लड़ता,झगड़ता है और फिर प्यार से मनाता है
शायद तभी यह रिश्ता,इतना पावन कहलाता है|
बचपन में,नहीं देता था सहारा,न हाथ पकड़ उठाता है |
"खुद उठो,मैं साथ हूँ तेरे"-कह मेरा मन बहलाता है |
"प्रकाश बन चमको तुम"-कहना उसका स्याह रातों को ,
आज समझ पायी हूँ मैं ,उसकी कही सब बातों को |
चाहत थी उसकी छोटी बहन को,आत्मनिर्भर बनाने की,
ज़िंदगी की हर प्रतिस्पर्धा में,प्रथम स्थान पर लाने की |
यथार्थ में - हिम्मत है वो मेरी ,वो मेरी जान है,
उसके लिए स्नेही की जान भी कुर्बान है |
'स्नेही' के हाथों की लकीरें शायद बहुत ख़ास हैं |
तभी ईश्वर-प्रदत वरदान,बड़ा भाई मेरे पास हैं |
-डॉ. कंचन शर्मा 'स्नेही'
नई दिल्ली
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