माँ,
तुम केवल एक शब्द नहीं थीं,
मेरे जीवन की सबसे सुंदर प्रार्थना थीं।
ईश्वर ने जब ममता को आकार दिया होगा,
तब तुम्हारा ही चेहरा उकेरा होगा।
तुमसे ही घर में उजाला था,
तुमसे ही हर रिश्ता निराला था।
तुम्हारी हँसी से खिल उठती थीं सुबहें,
तुम्हारे आँचल में सिमट जाती थीं मेरी सभी व्यथाएँ।
माँ, तुम पावन गंगाजल-सी निर्मल थीं,
वेदों की ऋचाओं-सी पवित्र थीं।
तुमने ही सिखाया था-
सत्य क्या है, संस्कार क्या हैं,
त्याग क्या है और प्रेम का वास्तविक अर्थ क्या है।
तुम मेरे अटूट विश्वास की नींव थीं,
मेरे हर साहस की वजह थीं।
जब भी जीवन ने थकाकर रुलाया,
तुम्हारे स्पर्श ने हर दर्द भुलाया।
आज तुम इस धरती पर नहीं हो माँ,
पर ऐसा एक भी दिन नहीं
जब तुम्हारी कमी ने आँखें नम न की हों।
तुम्हारी आवाज़ आज भी
मेरी तन्हाइयों में धीरे से गूँज जाती है।
कभी हवा बनकर मेरे चेहरे को छू जाती हो,
कभी दुआ बनकर मेरी राहों में बिछ जाती हो।
जब भी टूटकर बिखरने लगता है मन,
माँ, तुम अदृश्य होकर भी
मुझे फिर से संभाल जाती हो।
तुम्हारे जाने के बाद समझ आया-
माँ केवल एक रिश्ता नहीं होती,
वह संपूर्ण संसार होती है।
तुम जहाँ भी हो माँ,
ईश्वर की गोद में सदा मुस्कुराती रहना।
तुम्हारी ‘स्नेही’आज भी
हर धड़कन में तुम्हें ही महसूस करती है।
- डॉ. कंचन शर्मा ‘स्नेही’
नई दिल्ली
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