आओ लहराएं तिरंगा गगन के उस पार तक !



आओ लहराएं तिरंगा गगन के उस पार तक ।

अमर बलिदानी जहाँ हैं स्वर्ग के उस द्वार तक ।।


यह धरा उनकी धरोहर है इसे बन्दन करें।

रक्त कण-कण में उन्हीं का आओ मस्तक पर धरें ।

उनके पदचिन्हों का मिल कर आज सब पूजन करें।

हम जिन्हें अर्पण न कर पाये विजय के हार तक ।।

आओ लहराएं तिरंगा गगन के उस पार तक !


गोलियाँ थी वक्ष में, पर युद्ध में बढ़ते गये । 

शत्रुओं के शीश पर निज चरण रज धरते गये ।

मातृभूमि के दुलारे नाद यह करते गये -

“हम न छोडेंगे कभी दुश्मन को उसके द्वार तक ।”

आओ लहराएं तिरंगा गगन के उस पार तक !


उनके गीतों में वतन के प्यार की झंकार थी।

उनके गीतों में चमकती शौर्य की तलवार थी । 

मातरम् वन्दे की वाणी विजय का अवतार थी।

जो स्वयम् अवतार हों,रूकते हैं कब अधिकार तक ।

आओ लहराएं तिरंगा गगन के उस पार तक !


आज का यह पर्व उनके त्याग का मधु फूल है। 

मातृ भूमि के हृदय की शान्ति का मृदु कूल है।

राष्ट्र की स्वाधीनता का स्नेह सिक्त दुकूल है।

प्राण रहते टूटने ना देंगे कोई तार तक ।।

आओ लहराएँ तिरंगा गगन के उस पार तक !


उनके स्वप्नों को करें साकार यह संकल्प हो ।

देशद्रोही के लिये बस मृत्यु एक विकल्प हो। 

जन्मभूमि के लिये फिर जन्म हो, फिर जन्म हो ।

हम जनम पाते रहें इस सृष्टि में संसार तक ।।

आओ लहराएं तिरंगा गगन के उस पार तक !

अमर बलिदानी जहाँ हैं स्वर्ग के उस द्वार तक !!




रचना- रत्न कुमार शास्त्री

जयपुर, राजस्थान

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