ख़्याल- ज़रूरी था
खामोशी टूटनी भी ज़रूरी थी
दिल की बोलना भी ज़रूरी था
बेशक मुश्किल बहुत था पर
गिरह खोलना भी ज़रूरी था
हर बार रोका था खुद को
कहीं कोई बात न फैले
मगर खुशबू ए गुल की तरह
बेइख्तियार होना भी ज़रूरी था
समंदर से गहरी आँखों का
पानी से खारे अश्कों का
दिल पर लगे ज़ख्मों के
दाग़ धोना भी ज़रूरी था
खुद की खुद ही से छिड़ी
बेमकसद जंग के साथ
अपने हिस्से की ज़िन्दगी को
जीना भी ज़रूरी था
जुबां से कहना ज़रूरी था
कानों से सुनना ज़रूरी था
तो कहीं कहीं दिल से
महसूस करना भी ज़रूरी था
आशु शर्मा
मुम्बई, महाराष्ट्र

superb
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