भिखारी

 भिखारी


कुछ ढूँढ रहा है वो,कचरे में,

जाने क्या....?

रोटी या किस्मत अपनी।


तन पर चिथड़े हैं कम,

आँखें  भी उसकी हैं नम,

होंठों पर भी पपड़ी,जमी हुई है ।

शायद किस्मत इसकी,

इससे रूठी हुई है।


धुँधले सपने, गीला दामन,

मायूस जवानी, भूखा बचपन।

बिखरे सपने, ठहरा जीवन,

भूखे पेट ना भाए सावन।


यहाँ-वहाँ वो हाथ फैलाए,

लोगों के भी ताने खाए।

मीठे सपने, चैन की नींद,

इन बातों को झूठा ठहराए।


माँगते हैं सभी यहाँ पर,

क्यूँ केवल वह ताने खाए।

है नहीं क्या कोई विधाता,

इस जग में...?

जो इसकी किस्मत इसे लौटाए,

ज़्यादा नहीं बस,

' दो जून रोटी',

हर्षित हो यह भी खा पाए।





डॉ. कंचन शर्मा "स्नेही"

नई दिल्ली   

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