अंतर्मन में झांकना है जरूरी

अंतर्मन में झांकना है जरूरी


वर्तमान महामारी के समय में पूर्व के अनुभाविक  विश्लेषण बेमानी हो गए हैं। पहले के अनुभवों से अलग,अब  पिछले अनुभवों से हम ज्यादा फायदा नहीं उठा सकते हैं।
ये दौर और इनकी परिस्थितियाँ सर्वथा भिन्न है। इस समय हमें आगे का रास्ता बिना निश्चित संभावनाओं के साथ तय करना है।कोविड-19 ने हमें सिखाया कि हमें संभावनाओं को भापते हुए आगे बढ़ना है।आनिश्चितताओं में भी रास्ता निकालना है,बजाय टेक्नोलॉजी पर निर्भर किए।
इस महामारी के बाद की सबसे अच्छी खबर यह होगी कि हम यह पाएंगे कि अपनी चेतना,  आस्था और सजगता के जरिए लोगों की इस दुनिया के बारे में सोच बदल गई है।अच्छे कार्यों के लिए और जीवन में उनका महत्व के बारे में लोग दोबारा सोचने लगे हैं।वह क्या और क्यों कर रहे हैं। एक सामान्य सुझाव जो किसी व्यापार को चलाते हुए पहले परिस्थितियों के संदर्भ में दिया जा सकता है, हो सकता है अब वो स्वीकार्य न हो, जैसे कि फुर्ती से कोई निर्णय मत लो, पहले जानकारी इकट्ठा करो, समझो , तब  लो और किसी एक्सपर्ट से बात करो, जोखिम पता करो और उसके अच्छे और बुरे असर के बारे में जानों। अगर किसी कार्य को करने के लिए तमाम जानकारियों के बाद भी  लंबे समय तक इंतजार करना पड़ रहा हो, तो ज्यादा वक्त ना लगा तुरंत शुरू करें। अभी जितने भी स्टार्टअप्स शुरू हुए हैं वह सब एक आईडिया से ही शुरु हुए हैं चाहें शुरुआती जानकारी आधी अधूरी हो। 
जब आपका दिमाग वर्तमान अनिश्चितताओं के दौर में निर्णय लेने में असहज लगे तो मेडिटेशन उसे मदद कर सकता है। किसी भी जानकारी में हमें तीन तरह से प्रभावित करने की ताकत होती है- दिमागी, शारीरिक और आत्मिक। 
जब आप अपने चित् से विपरीत चलते हैं तो आपको गलती  की अनुभूति होती है और आप निर्णय का स्वागत नहीं कर पाते। इसके विपरीत जब आप अपने चित् के लिए हुए निर्णय के साथ जाते हैं तो आप प्रसन्न चित् होते हैं। चाहे वह कार्य करें या ना करें, यह हमारे अंदर  ताकत और आशा जगाता है। जिससे हमें बहुत ही आसान और फटाफट से किसी भी समस्या को हल करना आ जाता हैं। समस्या को कैसे सुलझाना है, क्या करना है, पता चल जाता है। जितना ज्यादा आध्यात्मिक होंगे उतना ही स्वयं के गुणों में वृद्धि होगी और आपकी निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती जाएगी। धार्मिकता दुनिया को देखने का एक नजरिया है। भावनाएं महसूस करने का यह एक बहुत गहरा तरीका है । 
जितना हम अंतर्मन में झांकते है उतनी ही हमारी क्षमता बढ़ती है यह देखने की, कि असलियत क्या है , हमारी आंखों को क्या दिखता है और जो दिखता है उसका कितना गहरा असर है । इस तरह के परसेप्शन हमें किसी भी गलत निर्णय को लेने से रोकते हैं और हम आखिरी समय पर भी गलत किए हुए निर्णय को सही कर पाते हैं। 
हमें सबसे ज्यादा जरूरत है ऐसे दिमाग की जिसमें चेतना हो । चेतना जगाने के लिए हमें अपने अंदर मेडिटेशन करने की जरूरत है । इस चेतना से जुड़ने के लिए ,अपनी शांति बनाए रखने के लिए हमें निरंतर प्रयास करते रहने की जरूरत होती हैं। 
भागवत गीता हमें बताती है कि हमें क्या करना चाहिए  और किस प्रकार से करना चाहिए। अपने रास्ते में आई हुई हर समस्या को कैसे सुलझाना चाहिए । गीता में ही हमें सिखाया गया है कि हम भगवान के साथ वार्तालाप भी कर सकते हैं। उसके लिए आपको एक शुद्ध चेतना वाला चित् चाहिए होता है । यह उसी प्रकार है कि कोई भी अंतरिक्ष में स्थापित सेटेलाइट से संपर्क स्थापित नहीं कर सकता अगर बीच में बादल है या एंटीना पर डस्ट लगी हो। 

इसलिए आज हमें उस सकारात्मकता की जरूरत है जो हमें यह याद दिलाती है कि हमारे पास ऐसा क्या है जिस की अहमियत हम भूल गए हैं । आज हमें बगैर किसी से तुलना किए अपने आप से मोहब्बत करनी सीखनी चाहिए ।खुशी का यही मूल मंत्र है। स्वयं के पास क्या है महसूस करें और दूसरों से तुलना ना करें।

 
लवलीना माथुर 
जयपुर, राजस्थान

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