माँ

 माँ

माँ से ही जन्नत है 

माँ बिन माँगी मन्नत है 

माँ तो है चढ़ता सवेरा 

करती है दूर अंधेरा....

जब धीमे धीमे हवा चले

मुझको माँ की लौरी सी लगे 

समेट दे गम मेरे सारे

माँ का आँचल छोटा न पड़े 

माँ की ममता का मोल नहीं 

गाली भी माँ की दुआ लगे

घर मुझ को घर नही लगता है 

जब तक घर पर मुझे माँ न दिखे

मुझ को हंसाती थी वो 

झूला झुलाती थी वो

जब रूठ जाता था तो

मुझ को मनाती थी वो 

बातों पे मेरी 

वो मुस्कराती थी 

गलती पे मेरी 

मुझे समझाती थी 

उंगली पकड़ कर 

माँ ने ही दुनिया दिखाई

माँ तो है चढ़ता सवेरा 

करती है दूर अंधेरा....



आशु शर्मा 

मुम्बई, महाराष्ट्र

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