-अमित कुमार-
इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल,
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है,
इसके साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे,
खत्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है।
सच में फिल्म लीडर के इस गीत को रचने वाले शकील बदायुनी को भी अंदाजा नहीं होगा कि 58 साल बाद भी मोहब्बत की निशानी की यूं चर्चा होगी। बात कोर्ट-कचहरी तक जा पहुंचेगी। ताजमहल के बंद पड़े 22 कमरे खोलने से शुरू हुआ विवाद अब स्वामित्व पर जा अटका है। भाजपा सांसद दीया कुमारी की एंट्री से विवाद ने चिंगारी का रूप ले लिया है। राजसमंद से सांसद दीया कुमारी का दावा है कि अमर प्रेम की मिसाल ताजमहल उनके पुरखों की जमीन पर बना है। करीब चार शताब्दी पहले शाहजहां ने उस पर कब्जा जमा लिया था। उस दौरान इसके खिलाफ अपील भी नहीं की गई। अपने दावे की पुष्टि के लिए उन्होंने पूर्व राजघराने के पास रेकॉर्ड होने की भी बात कही है। पोथीखाने के दस्तावेजों से कौन सा सच बाहर आएगा यह तो वक्त बताएगा लेकिन इतिहास के पन्ने पलटने से यह जरूर पता चलता है कि आगरा का ताज जयपुर की ही देन है। उपलब्ध साक्ष्य इसी ओर इशारा करते हैं।
आगरा में चार हवेलियों के बदले मिली जमीन
दुनिया में मोहब्बत का पैगाम देने वाली इस संगमरमरी इमारत के साथ बशर्ते मुगल बादशाह शाहजहां और मुमताज का नाम जुड़ा हो लेकिन हकीकत में यह जयपुर के पूर्व राजघराने की ही देन बताई जाती है। ताज नगरी के तौर पर आगरा जरूर मशहूर है पर वास्तविकता यही है कि जयपुर की जमीन पर ही विश्व विख्यात इमारत खड़ी है। कहा जाता है कि जिस जगह यह सफेद आश्चर्य खड़ा है वह जमीन राजे-रजवाडों के दौर में जयपुर रियासत के पास थी। तब मुगल बादशाह शाहजहां ने चार हवेलियों के बदले वह जमीन प्राप्त की थी।
मुमताज के सपनों का वो बगीचा
इतिहासकारों का कहना है कि ताजमहल अस्तित्व में आने से पहले मुमताज की कल्पनाओं में बस गया था। मुमताज ने सपने में ऐसा ही नायाब महल देखा था जिसके चारों और बाग-बगीचे हों। ऐसा महल जिसके बारे में कभी किसी ने नहीं सुना या देखा हो। वह चाहती थीं कि उसकी मौत के बाद उसकी याद को ऐसे ही किसी महल के जरिए जीवंत रखा जाए। 28 जून 1631 ई. को मुमताज का जब निधन हुआ तब उसे आगरा से दूर जेनाबाद में अस्थायी तौर पर दफनाया गया। छह माह बाद उसकी पार्थिव देह को आगरा में यमुना किनारे लाया गया। तब वह स्थान आमेर के तत्कालीन शासक मिर्जा राजा जयसिंह का बगीचा हुआ करता था। शाजहां ने इसी बगीचे में पत्नी मुमताज की इच्छा के अनुसार दफनाने के लिए ताजमहल के निर्माण करने का विचार किया।
शाहजहां ने मुफ्त में लेना उचित नहीं समझा
इतिहासकारों का मत है कि शाहजहां ने मुमताज की कब्र के लिए जो जमीन ली वो जयपुर रियासत की थी। लेकिन वो मुफ्त में जमीन लेने के पक्ष में नहीं था। साथ ही धार्मिक विवाद से बचना चाहता था। इस पर उसने बगीचे के बदले मिर्जा राजा जयसिंह को राजा भगवानदास माकड़ की हवेली, माधोसिंह माकड़ की हवेली, रूपसी बैरागी की हवेली दर मोहल्ला बाजार टेक्का खान माकड़ व इसी मोहल्ले में सूरज सिंह के पुत्र चांद सिंह की हवेली दी। अब्दुल हमीद लाहौरी लिखित बादशाहनामा, मोहम्मद सलीह काम्बो लिखित शाहजहांनामा में इस बाग के मिर्जा राजा जयसिंह के स्वामित्व में होने की बात कही गई है।
मुगल दरबार ने भेजे थे दो फरमान
इतिहासकारों का मत है कि शाहजहां ने मिर्जा राजा जयसिंह से वह बगीचा लेने के लिए तब दो फरमान जारी किए थे। ये फरमान आज भी बीकानेर अभिलेखागार के कैटलॉग में सुरक्षित बताए जाते हैं। कहा जाता है कि कैटलॉग के द्वितीय भाग में मुआवजे संबंधी दो (176,177) फरमान हैं जो मुगल दरबार ने मिर्जा राजा जयसिंह को भेजे थे। इन फरमानों में मुआवजे के तौर पर चार हवेलियां देने को कहा गया था। पहला फरमान जहां एक समझौता था वहीं दूसरा डीड का स्थानांतरण था।
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