रिश्वत मांगने की शिकायत करने में नागौर जिला काफी पीछे है। तकरीबन 23 साल में एक बार भी यह आंकड़ा दहाई तक नहीं पहुंचा। रकम भी सामान्य ही रही, सिर्फ दो बार ही घूस की राशि एक लाख पार पहुंची। सिर्फ तीन महिला कार्मिक ही अब तक ट्रेप हुईं। राजस्व कार्मिक रिश्वत के खेल में टॉप पर रहे।
नागौर जिले में आधा दर्जन के आसपास ही ऐसे मामले सामने आते हैं। इसका मुख्य कारण यहां के लोगों का शिकायत करने से बचना है। पिछले बीस-पच्चीस साल से यह सुविधा-शुल्क की तरह माना जा रहा है, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की मुस्तैदी के बाद भी यहां जागरुकता नहीं आई।
सालभर में चार-छह मामले ही आमतौर पर यहां पकड़े गए। राजनीतिक दबाव अथवा गलत का विरोध करने का खमियाजा यह है कि नागौर बड़ा जिला होने के बाद भी घूसखोरी पकड़वाने में कई छोटे जिलों से पिछड़ रहा है। बताया जाता है कि प्रदेश के आधा दर्जन जिले नागौर से काफी छोटे होने के बाद भी ट्रेप के मामलों में बहुत आगे हैं।
औसतन हर साल छह मामले
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2000 से 2022 (अब तक) कुल 130 मामले सामने आए। इनमें रिश्वत लेते 127 पुरुष तो तीन महिला कर्मचारी/अफसर रंगे हाथों पकड़े गए। तकरीबन 23 साल में आए 130 मामले यानी औसतन हर साल करीब छह। सर्वाधिक नौ मामले वर्ष 2008 में पकड़े गए थे। वर्ष 2006, 10, 11 और 12 में आठ-आठ मामले पकड़े गए। कभी भी यह आंकड़ा दहाई तक नहीं पहुंचा। बाकी सालों में कभी सात, छह पांच या चार तक ही यह सिमटा रहा।
दस-पांच हजार में ही ज्यादा गिरफ्तार
सूत्र बताते हैं कि अधिकतर मामूली राशि लेते ही पकड़ में आए। वर्ष 2000 में हुए आधा दर्जन मामले में रिश्वत की सर्वाधिक राशि तीन हजार थी, जो वर्ष 2021 में तीस हजार रही। अधिकांश बरसों में पांच हजार या दस-बारह हजार तक ही मामला पहुंचा। वर्ष 2008 में घूस की सर्वाधिक राशि 90 हजार थी। बताते हैं कि अधिकांश मामलों में तीन-पांच या दस हजार रुपए वाले ही धरे गए।
कोई दलालों के चैनल से लेता तो कोई सीधेे
एक रिटायर अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि अधिकांश मामलों में घुस का चैनल बना होता है। अफसर अपने बाबू या चपरासी के थ्रू लेता है तो कर्मचारी किसी दलाल के थ्रू। नागौर जिला परिषद में तकनीकी सहायक सुरेश कुमार घूसखोरी में पकड़ा गया तो उसके साथ दलाल राजेश सांगवा भी धरा गया। पता लगा कि वो दलालों के थ्रू ही काम की स्वीकृति कर घूस ले रहा था।
कोई माने या नहीं माने, एसीबी की मुस्तैदी के साथ एंड्रायड मोबाइल ने भी घूसखोरों को सांसत में डाल दिया है। फोन रिकॉर्ड/टेप हो जाता है, वीडियो रिकॉर्डिंग हो जाती है। ऐसे में घूस लेना अब जी का जंजाल बनता जा रहा है। फोन पर अब बात करने से बचा जा रहा है तो किसी खास पर ही ऐतबार कर जोखिम उठाया जाता है।
राजस्व सबसे आगे, पुलिस पीछे
बताते हैं कि इन मामलों में राजस्व कार्मिक सबसे आगे रहे। यहां तक की पटवारी तक दो-तीन सौ रुपए लेते पकड़ में आए। घूसखोरी के लिए कभी बदनाम रही पुलिस इनसे काफी पीछे है। करीब एक दर्जन पुलिसकर्मी ही लपेटे में आए। घूस लेने में कोई कम नहीं पड़ा, शिक्षक हो या मेडिकल कर्मी, डीडवाना बीसीएमओ राजाराम शर्मा भी नहीं बचे। पानी-बिजली कनेक्शन देने में या फिर बिल पास करने वाले एईएन/एक्सईएन, कलक्ट्रेट का कोई काम हो या पंचायत अथवा उपखण्ड कार्यालय में छोटे-छोटे काम पर रिश्वत लेने के झमेले में फंसने से बच नहीं पाए।
एक बार भी नहीं पहुंच पाया दहाई का आंकड़ा
जानकारी के अनुसार जिले की नगरपालिका/परिषद में घूसखोरी के मामले भी कम नहीं रहे। लाख से अधिक के जो दो मामले पकड़े गए, वे भी यहीं के रहे। वर्ष 2018 में कुचामन नगर पालिका के ईओ किशनलाल कुमावत दो लाख की रिश्वत लेते धरे गए तो इसी साल मार्च में नागौर नगर परिषद के कनिष्ठ अभियंता माणक सांखला व स्टोर कीपर नंदकिशोर को सवा लाख की घूस लेते पकड़ा गया था। इसके अलावा कई अन्य मामले में भी इनके कर्मचारी भी एसीबी के हत्थे चढ़ चुके हैं।
एक नजर में
वर्ष मामले सर्वाधिक राशि
2000 06 3000
2001 04 5600
2002 06 5000
2003 07 3000
2004 04 10000
2005 05 5000
2006 08 40000
2007 06 5000
2008 09 90000
2009 07 20000
2010 08 13000
2011 08 15000
2012 08 15000
2013 07 22000
2014 04 9000
2015 04 12000
2016 04 4000
2017 05 30000
2018 06 200000
2019 04 10000
2020 04 10000
2021 04 30000
2022 02 125000
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