शत
शत वन्दन! शत शत प्रणाम !
भारत
भूमि के भाग्य तिलक !
हे
अमर कीर्ति ! शाश्वत महान !
शत
शत वन्दन शत शत प्रणाम !
उस निर्मम युग में आये थे।
दीनों-दुखियों के जीवन में,
जब घोर अँधेरे छाए थे।
मानव मानव में प्रेम न था,
बस स्वार्थ स्वार्थ के साए थे।
मरती मानवता को तुमने,
तब दिया प्रेम पीयूष दान।।
शत
शत वन्दन शत शत प्रणाम !
हे भारत माता के सपूत !
वैदिक संस्कृति के अमर दूत !
चल पड़े विश्व को समझाने,
हम सब धरती के एक पूत ।।
तेरी वाणी की वीणा ने,
झंकृत कर डाली दसों दिशा।
भारत का माल किया उन्नत,
जग ने पाया तब आत्मज्ञान।।
शत शत वन्दन शत शत प्रणाम !
तुम विश्व विभूति थे किन्तु,
अभिमान नहीं था जीवन में।
तुम सदाचार की सीमा थे,
वैराग्य भरा था जीवन में।।
मानव नानवता को माने,
यह दर्द भरा था जीवन में।
बस यही लक्ष्य था जीवन का,
इस पथ पर चलते गये प्राण।।
शत शत वन्दन शत शत प्रणाम !
हे परमहंस के परम शिष्य,
हे परमतत्व के विज्ञानी !
हे त्रिगुणातीत! हे संन्यासी!
परमात्मभक्ति शक्तिमानी ।
तुम चलते रहे सदा सत्पथ,
जीवन में हार नहीं मानी।
हे अमर 'रत्न' भारत माँ के।
तुम पर न्यौछावर जग महान।।
शत
शत वन्दन रात शत प्रणाम !
राजस्थान
( जयपुर)
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