जीवंत हुआ स्वर्गीय निर्मल मिश्र का सन 2010 में रचा मधुर संगीत
सर्वेश भट्ट. कला समीक्षक
राजस्थानी लोकगीतों की परंपरा केवल संगीतात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मरुभूमि के जीवन-संघर्ष, नारी-संवेदना और सामाजिक यथार्थ का जीवंत दस्तावेज़ है। स्वर माधुरी मल्टीमीडिया एलएलपी की नवीन प्रस्तुति “एकलड़ी मत छोड़ो सा” इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हुई एक अत्यंत मार्मिक और आत्मस्पर्शी लोक-रचना के रूप में सामने आती है।
सीमा मिश्रा का आठवाँ एलबम: साधना की निरंतरता
यह एलबम सीमा मिश्रा की आवाज़ में पिछले दो महीनों में आया आठवां एलबम है, जो उनकी निरंतर साधना, प्रतिबद्धता और राजस्थानी लोकगीतों के प्रति उनके समर्पण का सशक्त प्रमाण है।
स्वर्गीय निर्मल मिश्र का कालजयी संगीत
इस प्रस्तुति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका संगीत है, जिसे राजस्थानी लोकगीतों के प्रख्यात संगीतकार स्वर्गीय निर्मल मिश्र ने सन 2010 में अपने जीवनकाल में तैयार किया था। उनका संगीत लोकधुनों की सहजता, मरुभूमि की सूनी तान और विरह की लंबी प्रतीक्षा की अनुभूति को अत्यंत सादगी और गहराई से अभिव्यक्त करता है।
एक अधूरी रचना से पुनर्जन्म तक की यात्रा
एलबम के निर्माता शिव विनायक शर्मा के अनुसार, निर्मल मिश्र ने अपने जीवनकाल में इस गीत का संगीत तैयार कर लिया था और सीमा मिश्रा की आवाज़ में इसकी रिकॉर्डिंग भी हो चुकी थी, किंतु उस समय यह गीत जारी नहीं हो पाया। वर्षों बाद, सीमा मिश्रा ने इसमें कुछ आवश्यक संशोधन कर इसे नए रूप में प्रस्तुत किया है। इस कारण यह एलबम केवल एक नई प्रस्तुति नहीं, बल्कि लोक-स्मृति और विरासत का पुनर्जागरण भी बन जाता है।
“एकलड़ी” — अकेलेपन से आगे की पीड़ा
गीत “एकलड़ी मत छोड़ो सा” की आत्मा राजस्थानी नारी-हृदय की उस पीड़ा में निहित है, जो सर्द, नीरव रातों में अपने साजन की उपस्थिति के लिए व्याकुल हो उठती है। यहाँ “एकलड़ी” शब्द केवल शारीरिक अकेलेपन का नहीं, बल्कि सामाजिक, भावनात्मक और मानसिक असुरक्षा का प्रतीक बन जाता है।
कोकिल कंठ में ढली करुण संवेदना
सीमा मिश्रा का कोकिल कंठ इस भाव को ऐसी करुणा, सादगी और आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है कि श्रोता स्वयं को उस लोक-नायिका के स्थान पर अनुभव करने लगता है। कोई अलंकरण नहीं, कोई बनावट नहीं—बस सीधी, निश्छल पुकार।
लोक-संगीत की शुद्धता और सादगी
स्वर्गीय निर्मल मिश्र का संगीत संयोजन इस गीत की शक्ति है। इसमें न आधुनिकता का बोझ है, न अनावश्यक सजावट—बल्कि शुद्ध लोक-स्वरूप है, जो सीधे हृदय से संवाद करता है। सीमा मिश्रा द्वारा किए गए संशोधन गीत को आज के श्रोता के लिए अधिक प्रवाहपूर्ण बनाते हैं, पर मूल लोक-संवेदना अक्षुण्ण रहती है।
श्रद्धांजलि भी, सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी
यह एलबम केवल एक संगीत-प्रस्तुति नहीं, बल्कि स्वर्गीय निर्मल मिश्र को एक सजीव श्रद्धांजलि भी है। वर्षों बाद उनका रचा संगीत श्रोताओं तक पहुँचकर यह सिद्ध करता है कि सच्ची लोक-रचनाएँ समय की सीमाओं से परे होती हैं।एक सशक्त, संवेदनशील और कालजयी प्रयास
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