सजल

 सजल

ये समय बलवान था अब क्रूर कैसे हो गया।

आदमी ही आदमी से दूर कैसे हो गया।


संग साथी भी नहीं मन की व्यथा किससे कहें,

आज जीवन चाहने का  लूर कैसे हो गया।


रह रहें सब जन अकेले मुख छिपाये गेह में,

तंग है मानव यहाँ  मजबूर कैसे हो गया।


घोर तम की है डगर हम सब यहाँ कैसे चलें,

हौसला जो भी रहा थक चूर कैसे हो गया।


क्या भरोसा काल का किसको बनाले ग्रास वो,

लिख रहा जो भाग्य सबका सूर कैसे हो गया।


सूक्ष्म सा यह वायरस कितना कहर ये ढा रहा,

विश्व को लाचार कर मशहूर कैसे हो गया।


सरोज सिंह "सजल"

दिल्ली


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